सोमवार, 9 मार्च 2026

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ५७/६०*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷.
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ५७/६०*
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*पान फूल फल तरु लगै, त्यों त्रिविधि भांति गुरु शिख्य१ ।*
*फूल वास तरु गुरु लिये, रज्जब सब विधि पिख्य२ ॥५७॥*
५७-५९ में गुरु तथा शिष्य निर्णय का विचार कर रहे हैं - जैसे वृक्ष के पत्ते, फूल और फल लगते हैं, वैसे ही तीन प्रकार के शिष्य१ गुरु के होते हैं, उनकी भिन्न पद्धति अब सब देखें२ । फूल वृक्ष से सुगन्ध लेता है फूल के समान शिष्य गुरु से ज्ञान लेता है ।
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*बात१ पात छाया लिये, ज्ञान सु गुल२ सम वास ।*
*करणी३ फल गुरु तरु गहैं, त्रिविधि भांति परकास४ ॥५८॥*
जैसे पत्ता वृक्ष से छाया देने की योग्यता प्राप्त करता है, वैसे ही एक प्रकार का शिष्य गुरु से कथा१ करने की योग्यता प्राप्त करता है । जैसे पुष्प२ वृक्ष से सुगन्ध लेता है, वैसे ही दूसरे प्रकार का शिष्य गुरु से आत्म ज्ञान लेता है । जैसे फल वृक्ष से तृप्ति प्रदान करने की शक्ति लेता है, वैसे ही तीसरे प्रकार का शिष्य ज्ञान के अनुसार निष्ठा रूप कर्त्तव्य३ प्राप्त कर के अन्यों को भी तृप्ति प्रदान करता है । उक्त रीति से गुरु से शिष्य तीन प्रकार का ज्ञान४ प्राप्त करते हैं ।
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*गुरु तरु शिष लागे सु यूं, ज्यों डाल पान फल फूल ।*
*बात घात इक झड पडै, एक न छाडैं मूल ॥५९॥*
जैसे वृक्ष के डाल, पत्ते, फूल, फल लगते हैं, वैसे ही गुरु के साथ शिष्य लगते हैं । जैसे पत्ते, फूल और फल तो वृक्ष को किंचित वायु के वेग से छोड देते हैं किन्तु डाल वृक्ष के मूल को किंचित वायु के आधात से नहीं छोडती । वैसे ही कुछ शिष्य तो गुरु के कठोर शब्दों को श्रवण कर के गुरु का संग छोड देते हैं और कुछ गुरु के उपकार की महानता को देखते हुये कटु उपदेश से चलायमान नहीं होते और आजीवन गुरु का संग तथा सेवा को नहीं छोडते ।
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*रज्जब गृह गृह गुरु दीपक दशा, तिनहुँ न पूरे आश ।*
*गुण तारे भ्रम शीत का, सद्गुरु सूरज नाश ॥६०॥*
६०-६१ में सद्गुरु की विशेषता बता रहे हैं - घर घर में दीपक जलते हैं किंतु उनसें तारों के अदर्शन और ठंडी के अभाव की आशा पूर्ण नहीं होती । सूर्य उदय होता है तभी तारों का अदर्शन और ठंडी का अभाव होता है वैसे ही गुरुओं की दशा है, गुरु घर - घर में घूमते हैं किन्तु उनसे काम-क्रोधादि गुण और अज्ञान नाश नहीं होता । गुण और अज्ञान का नाश रूप कार्य तो सद्गुरु से ही होता है ।
(क्रमशः)

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