शनिवार, 14 मार्च 2026

*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ ९/१२*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*सोने सेती बैर क्या, मारे घण के घाइ ।*
*दादू काटि कलंक सब, राखै कंठ लगाइ ॥*
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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ ९/१२*
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*ज्यों घोबी की धमस सहि, उज्वल होय सु चीर ।*
*त्यों शिष तालिब निर्मले, मार सहें गुरु पीर ॥९॥*
धोबी की चोटें सहन करता है तब वस्त्र उज्जवल होता है, वैसे ही योग के साधक शिष्य योगी गुरु की और जिज्ञासु ज्ञानियों की परीक्षा रूप मार सहन करते हैं, तब ही वे निर्मल होकर सिद्धावस्था को प्राप्त होते हैं ।
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*जन रज्जब गुरु गुर्ज१ सहि, करहु न सोच विचार ।*
*काया पलटे कीट क्यों, बिन भृंगी की मार ॥१०॥*
किसी भी प्रकार का सोच-विचार न करके गुरु की कठिन शिक्षा रूप गदा१ को सहो अर्थात धारण करो । भृंगी के डंक की तथा ध्वनी की मार सहे बिना कीट का शरीर बदलकर भृंग कैसे हो सकता है ? वैसे ही गुरु की कठिन शिक्षा धारण करे बिना अन्त:करण कैसे बदल सकता है ।
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*अर्क१ इन्दु२ ज्यों सद्गुरु, गुण द्वय अजब अनूप ।*
*रज्जब तपते वर्ष हीं, शीतल सुधा स्वरूप ॥११॥*
सद्गुरु सूर्य१ और चन्द्रमा२ के समान हैं । उनमें तप्त गुण सूर्य का और शीतल सुधा रूप चन्द्रमा का गुण विद्यमान है । जैसे सूर्य अधिक तपता है तब वर्षा करता है । वैसे ही सद्गुरु से अधिक प्रश्न करने पर वे विचित्र उपदेश रूप वर्षा करते हैं । चन्द्रमा जैसे शीतल सुधा वर्षा कर सबको तृप्त करता है । वैसे ही सद्गुरु अपने शान्तिपूर्ण वचन-सुधा से सबको तृप्त करते हैं ।
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*सद्गुरु सतयुग की अगनि, ताव तेज अधिकार ।*
*शिष सोना ह्वै सोलहा, रज्जब कसनी सार ॥१२॥*
सत्ययुग की अग्नि में अधिक ताप होने से सोना श्रेष्ठ होता है । वेसे ही सद्गुरु में ज्ञान-तेज अधिक होने से शिष्य श्रेष्ठ बनता है । सोना के श्रेष्ठ बनने में ताप और शिष्य के श्रेष्ठ बनने में साधन कष्ट ही सार हेतु है ।
(क्रमशः)

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