🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*यहु रस मीठा जिन पिया, सो रस ही मांहि समाइ ।*
*मीठे मीठा मिल रह्या, दादू अनत न जाइ ॥*
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*रामरस ॥*
मेरा मन अमली राम रस भावै ।
पीवै नहिं तौ बाइड़ि आवै ॥टेक॥
अमल पियाँ मेरी आत्मा सुहेली ।
बिण पीयाँ तन तालाबेली ॥
राम रसाइण भरि भरि पीवै ।
राम रसाइण चाख्याँ जीवै ॥
साध सँगति अमल्याँ की टोली ।
सुरति सदाहीं हरि रस दोली ॥
बहुगुण घूंघणी ठूंगै ठांगै ।
अमल चढै तो निकुल न मांगै ॥
बषनां अमली जुग जुग जीवै ।
ग्यान नातणैं छाणैं पीवै ॥८०॥
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अमली = नशा करने का आदी । बाइड़ि = तलब, नशा करने की बार-बार इच्छा होना । सुहेली = सुखी । तालाबेली = व्याकुलता । अमल्याँ = नशा करने वाले । टोली = समूह । दोली = निमग्न, सरोबार । घूंघणी = मलशुई में घुटकर निश्चित परिमाण में बनी हुई शुद्ध अफीम । ठूंगै ठांगै = अफीम आदि नशे के पदार्थों (शराब आदि) को पीते समय खाये जाने वाले चर्बण, पदार्थ । निकुल = बिल्कुल । नातणैं = अंगोछा, कपड़े का टुकड़ा जिसमें अफीम आदि को छाना जाता है ।
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मेरा मन रामनाम-स्मरण रूपी रस का नशा करने का आदी है क्योंकि उसे उसमें आनंद मिलता है । कदाचित् किसी कारण से उसे उक्त रामरस पीने को नहीं मिलता है तो उसे उसकी बायड़(तलब) आती रहती है । उसके बिना पिये पूरा शरीर बेचैन रहता है ।
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मेरा मन रामरस को भर-भर कर पीता है – हमेशा राम-नाम का स्मरण ही करता रहता है । वह जीवित ही इस रामरस को पीकर रहता है । मेरे संगी साथी जो मेरे जैसा अमल पीते हैं वह साधु-संतों का समूह है । मेरी सुरति = चित्तवृत्ति सदैव ही हरिरस में निमग्न रहती है ।
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वस्तुतः इस रामरस रूपी अफीम तथा इसके साथ सत्संगति रूपी खाये जाने वाली अन्य वस्तुएँ बहुत ही गुणकारी = लाभकारी हैं । इस अमल के चढ़ जाने पर = एक बार इसका नशा पूर्णरूपेण हो जाने पर फिर नशा करने वाला और दूसरी कुछ चीज नहीं मांगता, चाहता ।
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बषनांजी कहते हैं, अमली युग-युगान्तरों तक जीता है = अमर हो जाता है । क्योंकि वह इस अमल को ज्ञान रूपी नातणें से छानकर पीता है । वेदों में कहा गया है “ऋतेज्ञानान्नमुक्ति” बिना ज्ञान के मुक्ति नहीं होती । बषनांजी ने अंत में ज्ञान रूपी नातणें का उल्लेख करके इसी तथ्य की ओर संकेत किया है ॥८०॥

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