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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*७.आज्ञाकारी का अंग ~ ५/८*
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*हरि आज्ञा में अणसरे१, गुरु दिनकर२ इकतार३ ।*
*रज्जब शिष सो किरण सम, सदा सु तिनकी लार ॥५॥*
ईश्वर आज्ञा अनुसार१ सूर्य२ निरन्तर३ चलते हैं, सूर्य की किरण भी सूर्य के साथ ही चलती हैं । वैसे ही ईश्वर आज्ञानुसार गुरु चलते हैं, गुरु आज्ञानुसार शिष्य सदा गुरु के साथ रहता है ।
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*चंद सूर पाणी पवन, धरती अरु आकाश ।*
*ये सांई के कहे में, त्यों रज्जब गुरु दास ॥६॥*
चन्द्रमा, सूर्य, जल, पृथ्वी और आकाश ये सभी परमात्मा की आज्ञा में चलते हैं । वैसे ही शिष्य गुरुदेव की आज्ञा में चलते हैं ।
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*पाणी पवन सूर्य शशि सोधे१, धन्य धणी४ जिन ये परमोधे ।*
*चूक२ हि चक३ हि न सीख मँझारी, जन रज्जब ता पर बलिहारी ॥७॥*
जल, वायु, सूर्य, चन्द्रमा, इन सबके व्यवहार हमने अन्वेषण१ करके देखे हैं, ये सब भूल२ कर भी भ्रम३ में नहीं पड़ते, निरंतर ईश्वर की शिक्षा रूप आज्ञा में ही चलते हैं । जिनने इनको उपदेश दिया है, वे स्वामी धन्य४ हैं मैं उनकी बलिहारी जाता हूँ ।
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*ज्यों हलवाई की हाट तज, माँखी कहीं न जाय ।*
*त्यों रज्जब गुरु शिष बँधे, उडहि न रहे उडाय ॥८॥*
जैसे हलवाई की हाट की मक्खयों को उडा उडा कर थक जाते हैं किन्तु हाट को छोड कर कहीं भी नहीं जातीं । वैसे ही शिष्य गुरु की आज्ञा में बँधे रहते हैं, हटाने पर भी नहीं हटते ।
(क्रमशः)

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