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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*एकै अक्षर पीव का, सोई सत्य करि जाण ।*
(राम नाम सतगुरु कह्या, दादू सो परवाण ॥*
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*मन ॥*
काति बहुड़िया सूत हजारी ।
तकुला कौ बलै काढ्यौ गुरि सतधारी ॥टेक॥
सूंबणि एक रु ताड़ी तीस । चरखौ भलौ घड़्यौ जगदीस ॥
चमरख दोइ र खूँटी चारि । मनसा दाँवणिं माल सँवारि ॥
सो बडी बहू नैं कातणि दीयौ । तिहि मारि ताकुलौ बाँकौ कीयौ ॥
पाछै ले ल्हौड़ी नैं दीनौं । तिहि नींठि बापुड़ी सूधौ कीनौं ॥
रहटा कौ सबद अनाहद रुणकै । राम नाम बाणी बोलै भुणकै ॥
जे कतवारी कात्यौ लोड़ै । तौ जोबनि माती तार जिनि तोड़ै ॥
सूत जुलाहा कै मनि भावै । कपड़ौ नाऊँ रामौंति पावै ।
ल्हौड़ी बहुटल कातण लागी । तौ बषनां घर की नाग्यौं भागी ॥७६॥
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बहुड़िया = जीव । सूत काति = रामनाम-स्मरण रूपी साधना कर । हजारी = जो सूत हजारों रुपयों में बिक सके । समाजशास्त्रियों के लिये यहाँ यह शब्द अत्यधिक महत्व का है । इससे ज्ञात होता है कि बषनांजी के समय में एक हजार रूपये का मूल्य = महत्व आज के करोड़ों के बराबर था ।
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कुछ समय पूर्व तक लाख का महत्व काफी था तथा व्यवहार में “लक्खा” “लखपति” जैसे शब्दों का व्यवहार उनके लिये होता था जिनकी गिनती धनिक लोगों में हुआ करती थी । ‘हजारीलाल’ नाम भी तबही प्रचलन में आया होगा जब किसी के पास हजारों रुपये रहे होंगे और उसकी गिनती धनिकों में होती रही होगी । धीरे-धीरे यह उपाधि नाम के रूप में रूढ हो गयी ।
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यहाँ हजारी से ‘बहुमूल्य’ का तात्पर्य है । तकुला = तकुआ, जिस पर कता हुआ सूत लिपटकर कूकड़ी के रूप में तैयार होता है । बल = वक्रपना = टेढापना । मन का विषयासक्त होना ही वक्र होना है । सत्स्वरूप परमत्मा में जिसकी स्थिति है ऐसे सद्गुरु महाराज ने नित्यानित्य तत्त्व का निश्चयात्मक बोध कराकर उस आसक्ति को समाप्त करवा दी ।
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तूंबणि = वह लोहे की छड़ जिस पर चरखे के दोनों चक्र घूमते हैं । यह बीच में लगी होती है तथा इतनी महत्वपूर्ण होती है कि यदि चरखे में से इसे निकाल दीया जाए तो चरखे का काम करना ही बंद हो जाए । बषनांजी ने शरीर में परिव्याप्त चैतन्य तत्व को तूंबणि माना है ।
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जब तक शरीर में चैतन्य रहता है तब तक हो शरीर की स्थिति है । अन्यथा शरीर की संज्ञा मृतक कहलाने लगती है । अतः चैतन्य का महत्त्व सर्वविदित ही है । तिस ताड़ी = चरखे में दो चक्र होते हैं । इन दोनों का निर्माण लकड़ी की जिन पट्टिकाओं से होता है वे ही ताड़ी कही जाती है इनकी संख्या बषनांजी ने तीस बताई है ।
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अष्टधा प्रकृति = प्रकृति, महतत्व, अहंकार, पंचमहाभूत; पंच तन्मात्रा, पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच कर्मेन्द्रिय उभयात्मक मन, पंच विषय = शब्द स्पर्श, रस गंध तथा प्राण । इन सभी का संघात शरीर है । इस चरखे रूपी शरीर के लिये रर ममा = राम रूपी दो चमरख तथा वैखरी, मध्यमा, पश्यंती, परा नामक चार वाणी अथवा, वैराग्य, भक्ति, ध्यान व ज्ञान रूपी चार खूँटियों का निर्माण जगदीश ने किया है ।
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मनसा = वृत्ति । दावणिं = चरखे के दोनों चक्रों को क्रौस रूप में सूत की मोटी रस्सी से बांधकर एक करते हैं उसे दाँवणि कहते हैं । जिस प्रकार पैरों की ओर खाट में दाँवण होती है । माल = सूत के धागे की रस्सी जो दांवण के ऊपर चढ़ी रहती है तथा जिसका संबंध तकुवे से भी होता है । जैसे-जैसे हत्थे को घुमाया जाता है, चक्र घूमते हैं । चक्र के साथ-साथ माल(वैल्ट) भी घूमती है जो तकुवे को भी घुमाती है जिससे सूत का निर्माण होता है ।
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यहाँ मनसा = वृत्ति को दांवण माना है । बड़ी बहू = बिगड़ैल वृत्ति, कुसंसस्कारी वृत्ति । बाँकौ = विषयासक्ति किया । ल्हौड़ी = छोटी = भगवद् उन्मुख वृत्ति । नींठ = मुश्किल से “असंशयं महावाहो मनोदुर्निग्रहंचलं ॥ अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
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बापुड़ी = बेचारी = वृत्ति । सूधौ = भगवदुन्मुख । रहटा = रटन = निरंतर राम नाम का स्मरण । अनाहद = बिना सीमा के, निरंतर । रुणकै = भगवन्नाम जप होता है । झुणकै = गुंजारित होती है । कतवारी = सूत कातने वाली, वृत्ति । कात्यौ = चरखा । लोड़ै = घुमावे अर्थात् साधना करे । जोवनमाती = साधनारत । तार = लय = साधना । जिनि = नहीं । टल = बचकर = विषयों से टलकर । नांग्यौ = जन्म-मरण रूपी नादारी = गरीबी = दुःख ।
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इस पद में मन की वृत्ति को लक्ष्य किया गया है । वस्तुतः जीव जैसे कर्म करता है, उन कर्मों के सूक्ष्म संस्कार मन पर वैसे ही जमा होते हैं । जैसे संस्कार होते हैं, व्यक्ति बलात् वैसे ही कर्म करने को पुनः प्रेरित होता है यह चक्र चलता रहता है । इसीलिए कहा गया है, मन ही मनुष्य को डुबोता तथा मन ही मनुष्य को तारता है । “मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्षयो” इन्हीं विचारों को बषनांजी ने चरखे, कातने वाली कतवारी आदि को प्रतीक बनाकर व्यक्त किये है ॥
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जगदीश ने तीस तत्वों को मिलाकर मनुष्य शरीर बनाया है जो अत्यन्त भला = उत्तम है क्योंकि इसमें वह स्वयं अपने अंश के रूप में निवास करता है । “ईश्वर अंस जीव अविनासी । चेतन अमल सहज सुखरासी ॥” अतः हे जीव ! तू ऐसा भजनकर जो तुझे तेरे अंशी स्वरूप परमात्मा से मिलाकर तेरा उससे एकाकार करा दे ।
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इसमें सतस्वरुप परमात्मा का अपरोक्ष प्राप्त सद्गुरु महाराज तेरे मन में अनेकों जन्मों की जमा विषयासक्ति को मिटाकर सहायता करेंगे । परमात्मा ने तुझे उसको प्राप्त करने के लिये ‘ररा’ ‘ममा’ = राम नामक दो चमरख तथा राम नाम की रटने के लिये चार प्रकार की वाणी रूपी चार खूँटिया प्रदान की हैं । अतः मनसा = वृत्ति रुपी दाँवण तथा माल को संभाल कर रख ।
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निश्चय ही तुझे तेरे अंशी स्वरूप परमात्मा की प्राप्ति हो जायेगी । वस्तुतः परमात्मा स्वरूप आत्मा मिलता नहीं है क्योंकि वह परमात्मा आत्मा के अतिरिक्त और कोई दूसरा तत्व नहीं है । प्राप्ति दूसरे की होती है जबकि बोध स्वयं का होता है । अतः आत्मा स्वरूप परमात्मा का बोध ही होता है । जीव ने सर्वप्रथम साधना रूपी सूत कातने को चरखा रूपी शरीर बड़ी बहु = संसारासक्त मन को दिया । उसने जीव को और अधिक विषयी बना दिया ।
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तत्पश्चात् जीव ने छोटी बहुरूपी परमात्मोन्मुख मन की वृत्ति को शरीर रूपी चरखा राम-नाम की साधना रूपी सूत कातने को दिया । उसने विषयासक्त मन को बहुत ही मुश्किल से विषयों से हटाकर परमात्मोन्मुख किया । परिणामस्वरूप रटन = स्मरण के दौरान रामनाम रूपी शब्द निस्सीम रूप में रुणकने = ध्वनि करने लगा । वाणी से रामनाम की अनवरत झंकार होने लगी । पुनः सावधान करते हुए कहते हैं, हे साधक ! एक बार साधना में लग जाने के उपरान्त साधना को बीच में ही मत छोड़ देना ।
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“निज सरूप निरखै नहीं, जब लग राम पुकारि । रामचरण घर क्यूँ लहै, जो पँथ मैं बैठे हारि ॥” यदि साधना पूरे जोश के साथ अनवरत करते रहोगे तो तुम्हारी साधना रूपी सूत परमात्मा रूपी जुलाहे को पसन्द आ जायेगा और वह तुम्हारा नाम अपने भक्तों में शुमार कर लेगा । तुम्हारा नाम “रामौती” रामजी का दास रख देगा, हो जायेगा । जबसे परमात्मोन्मुख वृत्ति रूपी छोटी बहु परमात्मा की भक्ति करने लगी तब ही से विषयों में आसक्ति रूपी गरीबी मिट गई और आमदनी रूपी परमात्मा से समीपता होने लगी ॥७६॥

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