शुक्रवार, 20 मार्च 2026

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ३७/४०

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ३७/४०
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एक सीस चहुं सीस पुनि, पंच सीस षट सीस ।
दश सिर और सहस्त्र सिर, नमत सकल जगदीस ॥३७॥
हे प्रभो ! हे जगदीश ! आप की इस असीम सामर्थ्य के प्रभाव से आप के सामने सभी अपना शिर झुकाये रहते हैं, सभी आप को दण्डवत् प्रणाम करते हैं । भले ही उन में, वह एक शिर वाला कोई बलवान् पुरुष हो या चार शिर वाला अतिशय सामर्थ्यशाली ब्रह्मा हो, या फिर दश शिर वाला महाबली रावण हो, या हजार शिर वाला शेषनाग ही क्यों न हो ! ॥३७॥
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सूरति तेरी खूब है, को करि सकै बखांन ।
बानी सुनि सुनि मोहिया, सुन्दर सकल जिहांन ॥३८॥
आप की आकृति(रूप) इतनी मनोरम एवं नयनाभिराम है कि कोई भी इस की अनुपम सुन्दरता का यथातथा वर्णन करने में कथमपि समर्थ नहीं है । आप की वाणी भी इतनी मधुर एवं प्रभावशाली है कि समस्त जगत् इसे सुनते ही मुग्ध हो जाता है ॥३८॥
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पलक मांहि परगट करै, पल मैं धरै उठाइ ।
सुन्दर तेरै ख्याल की, क्यौं करि जांनी जाइ ॥३९॥
आप के सामर्थ्य को यथार्थ रूप से कौन जान सकता है; क्योंकि आप में ही ऐसी सामर्थ्य है कि आप किसी भी अदृश्य वस्तु को क्षणमात्र में प्रत्यक्ष(प्रकट) कर सकते हैं और किसी प्रत्यक्ष दिखायी दे रही वस्तु को क्षणमात्र में लुप्त भी कर सकते हैं ॥३९॥
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ज्यौं का त्यौं ही देखिये, सुन्दर सब ब्रह्मंड ।
यह कोई जांनै नहीं, कब की मांडी मंड ॥४०॥
अतः आप के प्रति सभी श्रद्धालु जनों का यही कर्तव्य है कि वे आप के द्वारा रचित सृष्टि को उसी रूप में देखें जैसा कि आप ने उसको बनाया है; उस में कोई मीन मेष(ननु, नच, शङ्का, सन्देह) न करे । सचाई यह है कि इन में से कोई यह भी नहीं जान पाया कि आपने इस सृष्टि को कब बनाया । अतः आप के द्वारा रचित सृष्टि को अनादि मान लेने में ही हमें सुविधा है !१ ॥४०॥
(१ तु० -श्रीभगवद्‌गीता : 
आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद् वदति तथैव चान्यः । 
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणीति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ 
- अध्याय २, श्लो० २९.)
(क्रमशः)

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