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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग १७/२०
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उपजै बिनसै जगत सब, सुख दुख बहु संताप ।
सुन्दर करि न्यारा रहै, ऐसा समरथ आप ॥१७॥
यह संसार उत्पन्न एवं विनष्ट होता हुआ सुख दुःख आदि नानाविध वेदनाओं का अनुभव करता रहता है; परन्तु वह समर्थ प्रभु स्वयं इस अनुभव से पृथक् ही रहता है ॥१७॥
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सुन्दर करता राम है, भरता और न कोइ ।
हरता वह ई जानिये, ऐसा संमरथ सोइ ॥१८॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जब इस संसार का कर्ता(रचयिता) वह स्वयं निरञ्जन निराकार प्रभु है तो इसका भर्ता(रक्षक) उसके अतिरिक्त कौन होगा ! इतने विशाल संसार के पालन पोषण की सामर्थ्य अन्य किस में हो सकती है ! अतः उस सर्वशक्तिसम्पन्न को ही इसका रक्षक, भक्षक एवं पोषक मानना चाहिये ॥१८॥
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जाकी आज्ञा मैं सदा, धरती अरु आकास ।
ज्यौं राखै त्यौं ही रहै, सुन्दर मानहिं त्रास ॥१९॥
वे हमारे प्रभु इतने बलवान् एवं सामर्थ्यशाली है कि ये दोनों विशाल पृथ्वी एवं आकाश तत्त्व उनकी आज्ञा के पालन में सदा तत्पर रहते हैं । वे प्रभु उन को जैसी आज्ञा देते हैं, ये दोनों इन से भय एवं लज्जा मानते हुए एतदनुसार आचरण करते हैं ॥१९॥
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पावक पानी पवन पुनि, सुन्दर आज्ञा मांहिं ।
चन्द सूर फिरते रहैं, निश दिन आवै जांहिं ॥२०॥
इन पृथ्वी एवं आकाश के समान ही अग्नि, जल तथा वायु तत्त्व भी इन महाप्रभु के आज्ञाकारी ही रहते हैं । इसी प्रकार, चन्द्रमा और सूर्य भी, इनकी आज्ञा मान कर क्रमशः रात्रि एवं दिन में समस्त संसार को क्रमशः आलोकित करते रहते हैं ॥२०॥
(क्रमशः)

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