सोमवार, 16 मार्च 2026

*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ १७/२०*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*

*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ १७/२०*
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*मन भुजंग१ गुरु गारड़ी२, राखे कील करंड३ ।*
*जन रज्जब निर्विष करै, दुष्ट दशन कर खंड ॥१७॥*
सर्प१ को सर्प विष नाशक मंत्र जानने वाला२ कीलन मंत्र से कीलकर पिटारे३ रखता है और उसके विष से दूषित दाँत तोड़कर उसे निर्विष बना देता है । वैसे ही सद्गुरु उपदेश द्वारा मन की दूषित वृत्तियों को नष्ट करके मन को निर्विषय बना देते हैं ।
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*मन भवंग१ गुरु गरुड कहि, किया गगन को गौन ।*
*जन रज्जब जिवकी पड़ी, मूसे गटके कौन ॥१८॥*
सर्प१ को पकड़ कर गरुड़ आकाश को उड़ता है तब सर्प के हृदय से अपनी रक्षा की उपाय गिर पड़ती है, अर्थात वह अपने प्राणों की रक्षा भी नहीं कर सकता तब चूहे कैसे खायगा ? वैसे ही गुरु साधन द्वारा पकड़ कर साधक के मन को ब्रह्म में ले जाते हैं तब मन अपनी रक्षा भी नहीं कर सकता, अर्थात उसका मन पना भी वहाँ नहीं रहता तब विषयों का उपभोग कैसे कर सकता है ?
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*अनल पक्षि गुरु ने लिये, पंच तत्त्व अरु प्रान१ ।*
*ज्यों गगना२ गय३ ले उड़े, छूटा क्षिति४ अस्थान५ ॥१९॥*
जैसे अनल पक्षी हाथियों३ को लेकर आकाश२ मार्ग से उड़ता है तब हाथियों का पृथ्वी४ रूप स्थान५ छूट जाता है । वैसे ही पंच तत्त्व रूप पंच ज्ञानेन्द्रियां और मन१ को सद्गुरु उपदेश द्वारा उठाकर ब्रह्म में ले जाते हैं तब उनका मायारूप स्थान छूट जाता है । अनल पक्षी का परिचय- अनल पक्षी आकाश में रहता है । अंडा देता है तब अंडा पृथ्वी पर आता है । उस अंडे से जन्मा हुआ बच्चा खाने के लिये कुछ हाथियों को अपने पंजों में पकड़ कर पुन आकाश को चला जाता है ।
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*मन मैमंतों१ ले गये, सुगुरु अनल आकाश ।*
*सो न छुडाये छूट हीं, नख शिख किये गराश ॥२०॥*
अनल पक्षी हाथी१ को आकाश में ले जाता है तब वह छुड़ाने से नहीं छूटता, उसे तो नख से शिखा तक अनल पक्षी खा जाता है । वैसे ही श्रेष्ठ गुरु साधक के मन को साधन द्वारा ब्रह्म में ले जाते हैं तब उसका भी अभाव हो जाता है ।
(क्रमशः)

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