गुरुवार, 12 मार्च 2026

२१. अथ समर्थाई आश्चर्य को अंग १/४

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. अथ समर्थाई आश्चर्य को अंग १/४
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सुन्दर समरथ राम है, जे कछु करै सु होइ । 
जो प्रभु कौं कछु कहत है, ता सम बुरा न कोइ ॥१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हमारा इष्टदेव प्रभु निरञ्जन निराकार राम ऐसा समर्थ(शक्तिसम्पन्न) है कि वह जो कुछ करना चाहता है कर ही लेता है । ऐसे समर्थ प्रभु की जो मूर्ख निन्दा करता है,  उसके विषय में अपशब्द कहता है उससे बढ़कर अन्य कोई नीच(हीन विचार बाला) नहीं हैं ॥१४॥
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कर्त्तुमकर्त्ता अन्यथा,  सुन्दर सिरजनहार । 
पलक मांहि उतपति करै,  पलक मांहि संहार ॥२॥
उसके विषय में सभी शास्त्र एक स्वर से यही कहते हैं - "वह सृष्टिकर्ता(सिरजनहार) कुछ भी करने में, न करने में या विपरीत करने में सर्वथा समर्थ है१ ।" वह ऐसा शक्तिसम्पन्न है कि वह चाहे तो क्षणमात्र में नयी सृष्टि की रचना कर सकता है, पुरानी सृष्टि का नाश(संहार) कर सकता है ॥२॥ (१ कर्तुमकर्तुमन्यथा कर्तुं समर्थों भगवान् ईश्वर इति प्रोच्यते ।)
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ज्यौं हरि भावै त्यौं करै,  कौंन कहै यह नांहिं । 
अग्नि उपावै पलक मैं, सुन्दर पाला मांहिं ॥३॥
अतः प्रत्येक आस्तिक(भक्त) जन को वही कर्तव्य करना चाहिये जो उन प्रभु को अभीष्ट हो । उस की सत्ता का कौन निषेध करने का साहस कर सकता है । वह इतना सशक्त है कि वह चाहे तो क्षणमात्र में उष्ण(अग्निमय) पदार्थ को हिम(वर्फ) के समान सर्वथा शीतल(ठण्ढा) कर सकता है ॥ (क)
इस दोहा का यह भी अर्थ हो सकता है – 
हरि(भगवान्) जो चाहते हैं कर ही लेते हैं । उन की रचना में कोई यह नहीं कह सकता कि यह रचना यथार्थ नहीं है, या इसमें कोई न्यूनता है ! हरि में क्षणमात्र काल में उष्ण को शीत करने की क्षमता है ॥३॥ (ख)
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ज्यौं हरि भावै त्यौं करै, काले धौले रंग ।
धौले तें काले करै, सुन्दर आपु अभंग ॥४॥
उन को जो कार्य उचित लगता है उस को वे कर ही डालते हैं । वे अनुचित(काले) कर्म को उचित(धौला = धवल, श्वेत) करने की क्षमता(शक्ति) रखते हैं तथा उचित(श्वेत) कर्म को अनुचित(कृष्ण) कर्म में परिवर्तित करने की शक्ति रखते हैं । इतने पर भी उनमें यह विशेषता है कि वे सब करके भी सबसे तटस्थ(अभङ्ग = अस्पृष्ट) है ॥४॥
(क्रमशः) 

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