रविवार, 22 मार्च 2026

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ४५/४८

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ४५/४८
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उतपति सांई तैं किया, प्रथम हि वो ऊंकार । 
तिसतें तीनौं गुन भये, सुन्दर सब बिस्तार ॥४५॥ 
सृष्टिरचना : हे स्वामिन ! आप ने सर्वप्रथम ॐ का उच्चारण किया । उस से तीन गुण(सत्त्व, रज, तम) उत्पन्न हुए । उन ही से इस महत् तत्त्व आदि समस्त सृष्टि का विस्तार हुआ है१ ॥४५॥ 
(१ तु० - श्रीमद्भगवद्‌गीता : ॐ तत् सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः । - अ० ५, श्लो० २३.)
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तिनका रच्या सरीर यह, महल अनूपम एक । 
चौरासी लख जूनु ये, सुन्दर और अनेक ॥४६॥
आपने उन सब के सङ्घात(समन्वय) से अनुपम एवं दर्शनीय प्रासाद(महल) के सदृश इस शरीर की रचना की । इस में चौरासी लाख योनियों के छोटे बड़े अनेक प्रकार के शरीरधारी जीव दिखायी देते हैं ॥४६॥
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आपन बैठा गोपि ह्वै, सुन्दर सब घट मांहि । 
करता हरता भोगता, लिपै छिपै कछु नांहिं ॥४७॥ 
इतनी विशाल रचना के बाद आप स्वयं प्रत्येक प्राणी के हृदय में विराजमान हुए१ । इस प्रकार आप उस प्राणी के रचयिता, पालयिता एवं कर्मफलभोक्ता भी हुए । अतः उस प्राणी का कोई भी कर्म आप से गुप्त(छिपा हुआ) नहीं रह सकता ॥४७॥ 
(१ तु० - श्रीमद्भगवद्‌गीता : ईश्वरः सर्वभूतानां हद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । - अ० १८, श्लो० ६१.)
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ऐसी तेरी साहिबी, जांनि न सक्कै कोइ । 
सुन्दर सब देखै सुनै, काहू लिप्त न होइ ॥४८॥
इस समस्त पृथ्वी के प्राणियों पर आप का ऐसा कठोर अनुशासन(स्वामित्व = साहिबी) है कि उसे कोई साधारणतः समझ नहीं पाता । यह आप के विषय में कैसी आश्चर्यमयी बात है कि आप इस सृष्टि के सब कुछ(कर्ता धर्ता) होकर उसके किसी भी कर्म में लिप्त नहीं होते२ ॥४८॥ 
(२ तु० - श्रीमद्भगवद्‌गीता : नादते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । - अ०५, श्लो० १५.)
(क्रमशः) 

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