रविवार, 22 मार्च 2026

साथनि सहेलड़ी हे

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सहज सहेलड़ी हे, तूँ निर्मल नैन निहारि ।*
*रूप अरूप निर्गुण आगुण में,*
*त्रिभुवन देव मुरारि ॥*
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*विरह ॥*
साथनि सहेलड़ी हे, हेली म्हारौ रँग भरि राम रमाइ ।
मुख माँहैं दस आंगुला, हूँ इहिं बिधि लागौ पाइ ॥टेक॥
येकैं घर मांहै रहै, बासौ येकैं ठाँइ ।
हूँ तौ इहि दुख दूबली, यौ बोलै नहीं सु काँइ ॥
काया बन मैं हूँ गई, जदि कौ रह्यौ रिसाइ ।
मरिये हे नणद अबोलणैं, हूँ रही मनाइ मनाइ ॥
पाड़ौसणि म्हारी बुरी, जिहि की घाली राँति ।
साँई म्हारौ भरिषवौं, पणि मन मैं पड़ी भिराँति ॥
नीड़ौ ही अलगौ जिसौ, जे आवै नाहीं भाइ ।
हरि बिन दूभर क्यूँ भरौं, मोनैं रैंणि छमासी जाइ ॥
कामण मोहण बहु किया, मैं कीया बहुत उपाय ।
यहु क्याँही कै बसि नहीं, क्यूँ ही लीयौ न जाइ ॥
घणाँ दिनाँ कौ रुसणौं, जे अबकै भागौ नाहिं ।
कूवा केरी छाँह ज्यूँ, म्हारा मुवा मनोरथ माहिं ॥
कबहुँक हित चित चूनड़ी, कबहुँक परहरि जात ।
कहि बषनां काँयौं कहूँ, म्हारा ये ठाकुर की बात ॥७८॥  
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साथनि-सहेलड़ी = सदैव साथ में रहने वाली सहेली, मित्र = मनसा = वृत्ति । रंगभरि = प्रियतम के अनन्य प्रेम में सराबोर । राम रमाय = राम का साक्षात्कार । दस आंगुला = दसों इन्द्रियाँ । मुख माँहै = बहिर्मुख । लागौं पाइ = अन्तर्मुखी । एकैं घर = शरीर में ही आत्मा-परमात्मा दोनों का निवास है । काया बन = विषयों में अनुरक्ति । अबोलणैं = आपस में वार्तालाप न होना, परमात्मा शरीर ही में है फिर भी उसका साक्षात्कार नहीं होता । नणद = मनसा, वृत्ति । पाड़ौसणि = इंद्रियाँ । राँति = अंतर । भरिषवौं = सहनशील । पणि = किन्तु । भिराँति = भ्रांति, भ्रम, सत्य कुछ हो किन्तु सत्य समझ कुछ और लिया जाये । भाइ = भावपूर्वक, उत्साह-उमंग के साथ । दूभर = असह्य अमिलन, दुख । भरौं = सहन करूँ । मोनैं = मुझे (हाड़ौती क्षेत्र की बोली में मूँने, मोनैं मुझे के अर्थ में बोला जाता है) कामण-मोहण = वशीकरण आदि तांत्रिक क्रियाएं ।  
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हे सहेली रूपी मनसा मेरे प्रियतम रमैयाराम से अनन्य अनुराग करना प्रारम्भ कर दे ताकि मुझे उसका साक्षात्कार हो जाये, मैं उससे जी भरकर रम सकूँ । इस समय दसों इंद्रियाँ बहिर्मुख हैं । नाना विषयों का रसास्वादन करती हैं । जब तक ये अन्तर्मुख न होंगी, तब तक प्रियतम से मिलना कठिन है । अतः मैं इन्हें अंतर्मुख करके प्रियतम से मिलूँगी । 
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मैं और प्रियतम एक ही काया रूपी घर में रहते हैं । हमारा रात्रि निवास भी एक ही पर्यंक पर है । किन्तु वह न तो मुझ से कुछ भी बोलता है और न रमण ही करता है । बस, मैं इस अबोलणैं = वार्तालापहीनता के दुःख से दुखित हूँ, पतली हुई जाती हूँ । वस्तुतः जब से मैंने अपने आपको आत्मा न मानते हुए शरीर मानकर विषय भोगों से सम्पृक्त कर लिया है, तबही से वह परमात्मा मुझसे रूठ गया है । 
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हे वृत्ति ! उसके द्वारा मेरे से न बोलने के कारण मेरा मरना हो रहा है, मरती तो नहीं हूँ किन्तु जीवित भी नहीं हूँ । इसीलिये मैं बार-बार उसको बोलने = दर्शन देने के लिये मना रही हूँ = उसकी भावभक्ति से साधना कर रही हूँ । मेरे और उस प्रियतम के मध्य अंतर डालने वाली मेरी पड़ोसन रूपी इन्द्रियाँ ही हैं जिन्होंने बहिर्मुखता रूपी भ्रांति के कारण हमारे मध्य पड़दा डाल रखा है । 
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वैसे प्रियतम परम सहिष्णु = दयालु-कृपालु हैं किन्तु हमारे बीच में भ्रांति जो पड़ गई है । मनों में एक दूसरे के प्रति एक दूसरे का अविश्वास जो जम गया है । (विषयों की ओर आकर्षण ही भ्रांति है । जैसे ही बहिर्मुखता मिटकर अन्तर्मुखता होती हैं, वैसे ही परमात्मा का संस्पर्श होना प्रारम्भ हो जाता है) वास्तव में प्रियतम घर में भाव के साथ न आवे तो उसका घर में रहना, दूर रहने के समान ही है । 
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बिना परमात्म-दर्शन-लाभ के मेरी एक-एक रात्रि छः-छः महिने की रात्रि के समान व्यतीत हो रही है और मैं इस सह्य दुख से दुखती हूँ । मेरे से कैसे भी इस दुःख के कारण जीवित रहना संभव नहीं हो पा रहा है । मैंने प्रियतम को अपने वश में करने के लिये वशीकरणादि अनेक तांत्रिक क्रियाएँ की । 
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इनके अलावा श्रुंगारादि भी अनेक प्रकार की क्रियाएँ करके उसको रिझाने का प्रयत्न किया (अनन्य-अनुरागमयी राम-नाम-स्मरण रूपी भक्ति के अतिरिक्त अन्य सभी साधनाएँ, अन्य उपाय हैं जो परमात्मा को रिझाने में नाकाफी हैं ।) किन्तु वह प्रियतम किसी भी उपाय से वशीभूत नहीं हुआ, कैसे भी प्राप्त नहीं किया जा सका । 
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यदि अनंत जन्मों का परमात्मा से अलगाव इस जन्म में समाप्त नहीं हुआ तो मेरी मनोकामना ठीक वैसे ही मेरे मन में रह जायेगी जैसे कुवे की छाया कुवे में ही समाप्त हो जाती है । वह बाहर आकर किसी का उपकार नहीं कर पाती । बषनांजी कहते हैं, मैं मेरे ठाकुर की विचित्र बातें किससे कहूँ, किसप्रकार कहूँ क्योंकि वह कभी तो प्रेम-प्यार करता हुआ चूंदड़ी ओढ़ाता है और कभी छोड़कर दूर चला जाता है ॥७८॥ 

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