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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*शरीर सरोवर राम जल, माहीं संजम सार ।*
*दादू सहजैं सब गए, मन के मैल विकार ॥*
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*मन ॥ साषी लापचारी की ॥१* (१ इसका अर्थ “मन कौ अंग” की साषियों में देखो)
बषनां मैल बिचारि करि, धोयौ नहीं गवारि ।
पाणी पाप न ऊतरे, भावै सौ सौ डूंभी मारि ॥
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पद ॥
भाई रे सो संजम क्या कीजै । जिनि मांहिला मैल न भीजै ॥टेक॥
जे मन का मैल न धोवै । तौ कपट कियाँ क्या होवै ॥
मन का मैल गमावै । तौ निर्मल ह्वै आवै ॥
जे काया मांहि न खोलै । तौ क्या बाहरि जलि ढोलै ॥
मैल रह्या जिहिं ठाँई । तहाँ पाणी पहुँचै नाहीं ॥
जौ लग भरम न छूटै । तौ लग काट न खूटै ॥
भरम छाड़ि जब दीजै । तौ दीवै दीवा कीजै ॥
बाहरि मैल न होई । जाणैं तहाँ सब कोई ॥
जाणि बूझि ही कीजै । तौ बषनां हरि क्यूँ धीजै ॥८६॥
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संजम = पातंजलयोगसूत्र में धारणा, ध्यान तथा समाधि का समेकित नाम संयम बताया गया है । व्यवहार में तन का संजम तथा मन का संजम दो शब्दावली प्रचलित हैं । यहाँ तन-संजम को हेय = अनुपादेय बताकर मन के संजम को साधनामार्ग में अपरिहार्य बताया गया है । तुलसीदासजी ने ‘संजम यह न विषय की आसा’ कहकर मन के संयम को ही संयम माना है । खोलै = धोवै । जौ, तौ = जब तक, तब तक (ठेठ ब्रज भाषा के शब्दों का प्रयोग) कपट = पाखंड = वाह्याचार ।
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काट = कल्मष, मैल, विकार । खूटै = समाप्त हो । दीवै दीव = अभी तक जिस दिव्य आत्मा को कर्त्ता भोक्ता मानता है, वह दिव्यात्मा अपने निजी दिव्य रूप में ही बोध होने लगेगी । आत्मा न कभी कर्त्ता भोक्ता थी न है और न होगी । जीव अज्ञान से आत्मा को कर्त्ता भोक्ता मान लेता है । धीजै = विश्वास ।
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हे भाई ! ऐसा क्या संयम करते हो जिसके करने से अन्तःकरण के मैल = पापों का अंत ही नहीं होता है, अंतःकरण धुलकर निर्मल नहीं होता है । ऐसे पाखंड = आचारों को करने से क्या होने वाला है जिनके करने से मन के मैल ही न घुलते हों अथवा जो मन के मैलों को धो सकने में समर्थ ही नहीं हैं ।
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वस्तुतः यदि वे मन के मैलों को मिटा दें तो मन निर्मल हो जाता है और निर्मल-मन-जन ही परमात्मा को प्रियकर होते हैं “निर्मल मन जन सो मोहि पावा । मोहि कपट छल छिद्र न भावा ॥” (मानस, श्रीरामवाक्य) यदि तुम शरीर के अंदरूनी भाग को नहीं धोते हो तो उसे बाहर मात्र से धोने से, उसके ऊपर जल ढोलने से तात्पर्य ?
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जिस जगह मैल रहते हैं, वस्तुतः वहाँ जल पहुँचता ही नहीं है ? जब तक भ्रम = (आत्मा में अनात्मा तथा अनात्मा में आत्मा तत्त्व की प्रतीति और कथन ही भ्रम है, सीधे शब्दों में विपरीत प्रतीति को ही भ्रम कहते हैं) समाप्त नहीं होता तब तक अंतःकरण में विद्यमान अनात्मतत्वों के प्रति आसक्ति, विकार व पाप समाप्त नहीं हो सकते ।
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जिस समय भ्रम को छोड़ दोगे; बस, उसी समय तुम अपने असली रूप को पहचानकर परमात्मस्वरूप हो जाओगे । इस बात को सभी लोग जानते हैं कि शरीर के बाह्य भाग में मैल = पाप, विकार नहीं होते । इसके उपरान्त भी जानते समझते हुए भी यदि तुम आचार विचार ही करते हो तो फिर तुम पर परमात्मा किसी भी प्रकार विश्वास नहीं कर सकता, कभी भी तुम्हें अपना नहीं सकता ॥८६॥

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