गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ९/१२

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ९/१२
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सुन्दर पावक दार कै, भीतरि रह्यौ समाइ । 
दीरघ मैं दीरघ लगै, चौरे मैं चौराइ ॥९॥
जैसे छोटे बड़े काष्ठ में अग्नि रहती है, उसी प्रकार यह आत्मा भी लम्बे शरीर में लम्बा आकार तथा तदनुरूप चेष्टाएँ करने लगता है; चौड़े शरीर में चौड़ा(विस्तृत) आकार धारण कर लेता है और लम्बे में लम्बा ॥९॥
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रंचक काढै मथन करि, बहुरि होइ बलवंत । 
सुन्दर सब ही काठ कौं, जारि करै भस्मंत ॥१०॥
यद्यपि काष्ठ के मन्थन से निकलने वाली अग्नि की चिनगारी बहुत छोटी(कम = रंचक) होती है, परन्तु वह इतनी सामर्थ्यशाली होती है कि अवसर मिलने पर बड़े से बड़े काष्ठसमूह(विशाल वन) को भी जला कर भस्म कर सकती है ॥१०॥
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सुन्दर जड कै संग तें, भूलि गयौ निज रूप । 
देखहु कैसौ भ्रम भयौ, बूडि रह्यौ भव कूप ॥११॥
जैसे कोई भला आदमी किसी मूर्ख(जड) का सङ्ग करता हुआ पाप कर्म में प्रवृत्त हो जाता है, उसी प्रकार यह जीवात्मा भी जड(अचेतन = प्रकृति) का सङ्ग कर अपना तटस्थ स्वरूप ही भूल गया ! इस प्रकार वह अविद्या के भ्रम में फंस कर इस विकराल भवकूप में जा डूबा ॥११॥
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सुन्दर इन्द्रिय स्वाद सौं, अति गति बांध्यौ मोह । 
मीन न जानै बावरौ, निगलि गयौ सठ लोह ॥१२॥
वहाँ यह विषय भोगों के स्वाद में मुग्ध होकर कुटुम्ब के प्रबल मोह में फँसता चला गया । और अज्ञानता के कारण यह मूर्ख उस अबोध मछली के समान मांस के लोभ में लोह-कण्टक ही निगल गया ॥१२॥ (१)
(क्रमशः)

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