रविवार, 19 अप्रैल 2026

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~५७/६०*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~५७/६०*
.
*कह्या सु आया शिष कने१, अकह रह्या गुरु माँहिं ।*
*रज्जब वह कहिं और है, जो शब्द समावे नाँहिं ॥५७॥*
जो गुरु द्वारा शब्दों से कहा गया, वह शब्दार्थ रूप ज्ञान तो शिष्य के पास२ आ गया और जो न कहा गया वह गुरु में ही रहा, किन्तु जो ब्रह्म शब्दों में नहीं समाता वह तो शब्दार्थो से भिन्न कहीं और ही स्थिति में है अर्थात शब्द सदभाव से रहित निर्विकल्पावस्था में ही उसका आत्मरूप से साक्षात्कार होता है ।
.
*गुरु वकील निज ब्रह्म कने१, शब्द रहै संसार ।*
*बहु बचनों बहुते मिलैं, विरला सद्गुरु लार ॥५८॥*
ब्रह्म रूप न्यायाधीश के पास१ जीवात्मा का सद्गुरु रूप निजी वकील रहता है, और शब्द तो संसार में रहते हैं, विविध प्रकार के प्रवचनों रूप शब्दों द्वारा तो ब्रह्म से बहुत मिलते हैं अर्थात शब्दों द्वारा तो ब्रह्मज्ञानी बहुत बनते हैं, किन्तु सद्गुरु के बताये हुये साधनों द्वारा सद्गुरु के साथ लगकर कोई विरला साधक ही ब्रह्म का साक्षात्कार करता है । जैसे वकील न्यायाधीश के पास अपने मुवक्कल का समर्थन करता है, वैसे ही सद्गुरु अपने शिष्य का ब्रह्म के पास समर्थन करता है अर्थात संशय विपर्य्य से रहित अद्वैत स्थिति में लाता है ।
.
*ओंकार आतमा क्षीरं१, ताहि जमाया मथै घृत वीरं२ ।*
*वाणी तक्र३ जुदे जीव जाणी, उलटि मिले जाँवण पय४ पाणी ॥५९॥*
दूध१ को जमाकर मन्थन करते हैं तब घृत छाछ३ से अलग हो जाता है और वह छाछ का जल जामन के रूप में पुन: दूध४ में मिल जाता है किन्तु घृत नहीं मिलता । हे भाई२ ! वैसे ही ओंकार के चिन्तन द्वारा जीवात्मा का अन्त:करण स्थिर होता है, फिर स्थिर बुद्धि के द्वारा विचार किया जाता है तब अपरोक्ष ज्ञान होता है, अपरोक्ष ज्ञान होने पर जीव ओंकारादि शब्द रूप वाणी को और अपने स्वरूप में भिन्न जानकर स्व-स्वरूप ब्रह्म में ही स्थित होता है, फिर संसार में नहीं आता और शब्द पुन: संसार में मिल जाते हैं ।
.
*सीखी साखी विसाह्या१ बरा२, नाथ बोले खोटा३ न खरा४ ॥६०॥*
६०-६३ में अपने कथित विचारों पर प्रमाण दे रहे हैं - संतों की साखी तो सीखली और और लोगों को सुनाकर उससे बड़ा२ मोल लिया१ अर्थात उसका फल भोग ही प्राप्त किया । कारण - गुरु बिना अपने-आप सीखे हुवे साखी शब्दों से ब्रह्म-बोध नहीं होता, यह हम मिथ्या३ नहीं बोलते, सत्य४ ही कहते हैं ।
६० का पद्य गोरक्ष नाथादि में से किसी श्रेष्ठ नाथ संत का ज्ञात होता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें