🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू कहै- गरक रसातल जात है,*
*तुम बिन सब संसार ।*
*कर गहि कर्त्ता काढि ले, दे अवलम्बन आधार ॥*
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*विनती ॥*
थारौ रे गुण गोबिंदा, म्हारौ औगुणियौं कानि न कीजै ।
हौं तौ थाहरौ थाइ रह्यौ रे, मोनैं राम भगति दिढ़ दीजै रे ॥टेक॥
तुम्ह बिना डहकायौ थौ रे, थारै संगि न जागी रे ।
आगै ही चौरासी भरम्यौं, लखी न लागी रे ॥
भूलौ रे मैं भेद न जाण्यौं, ताहरी भगति न साधी रे ।
तूँ मिलिबा नैं रूड़ौ थौ, म्हारौ मन न मिल्यौ अपराधी रे ॥
तूँ समरथ मैं सरणैं आयौ, तूँ म्हारी पति राखी रे ।
बषनां सौं नींकै निरबहिये, मैं तुझ ऊपरि नाखी रे ॥९९॥
‘मैं अवगुण का पूतला, तुम गुणवन्ताँ राम ।
औगुण दिसी निहारियौ, तौ तीन लोक नहिं ठाम ॥”
बषनांजी प्रथम पंक्ति में इस साषी में व्यक्त विचारों के सदृश ही विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं, हे गोविन्द ! आपका गुण = स्वभाव है कि एक बार जिस भी जीव को अपना लेते हो, उसके द्वारा असंख्य अपराध करते रहने पर भी आप उसे त्यागते नहीं है ।
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जैसे रावण ने परस्त्री का हरण करके अशोक वाटिका में रखा वैसा ही कृत्य विभीषण ने अपनी भाभी मंदोदरी को अपनी पटरानी बनाकर किया किन्तु श्रीराम ने ऋषि-मुनियों द्वारा शिकायत करने के उपरान्त भी विभीषण को दंडित नहीं किया
“सोइ करतूति विभीषण केरी ।
सपनेहु सो न राम हिय हेरी ॥”
उल्टे उसके अपराध को अपने शिर पर ले लिया ।
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अतः मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि मैं सर्वतोभावेन आपकी शरण का आश्रय ग्रहण करके आपका हो गया हूँ । मेरे अवगुणों को ध्यान में मत लाइये । मैं तो सर्वविध तेरा और मात्र तेरा ही हो गया हूँ । अतः मुझे अपनी दृढ़भक्ति = अनन्य भक्ति प्रदान कर जिससे कि मेरी चित्तवृत्ति सदैव तेरे में ही अनुरक्त हुई रहे ।
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हे प्रभो ! तेरी शरण का आश्रय न लेने के कारण मैं माया-मोह में डहकायौ = भ्रमित हो गया था । तेरा आश्रय न लेने से मैं जाग नही सका था ।
“मोह निसा सब सोवनिहार ।
देखिय सपन अनेक प्रकारा ॥”
“या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशाः पश्यतो मुनेः ॥”
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इस जन्म से पूर्व मैं चौरासी लाख योनियों में जन्म लेकर मरता रहा हूँ । उनमें से एक जन्म भी लेखे नहीं लगा = सफल नहीं हुआ । मैं तुझे सर्वथा भूल गया । सत्यानृत, नित्यानित्य तत्त्व का भेद मैं जान ही नहीं सका और तेरी भक्ति की साधना भी नहीं कर सका । वस्तुतः तू तो दर्शन देने के लिये, मुझसे मिलने के लिये आकुल-व्याकुल था किन्तु मेरा अपराधी मन तेरी ओर उन्मुख नहीं हुआ क्योंकि वह तो विषयभोगों ही को भोगने में निमग्न था ।
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“ये यथा मां प्रपध्यंते तांस्तथैव भजाम्यहं ।”
हे परमात्मन् ! तू सर्व समर्थ है । अतः मैं तेरी शरण में आया हूँ । तू मेरी पत = लाज रख, मुझे शरण में रख ले । इसलिए मुझ बषनां का निर्वाह भली प्रकार कर क्योंकि मैंने मेरी सारी जिम्मेदारी तेरे ऊपर डाल दी है । जैसे बिल्ली का बच्चा बिल्ली पर पूर्ण भरोसा करके निश्चिंत रहता है वैसे ही मैं भी अब अपनी सारी जिम्मेदारी तुझे सौंप कर निश्चिंत हो गया हूँ ॥९९॥

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