सोमवार, 27 अप्रैल 2026

नाममाहात्म्य

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*राम भजन का सोच क्या, करता होइ सो होइ ।*
*दादू राम संभालिये, फिर बुझिये न कोइ ॥*
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*राग टोड़ी ॥७॥ नाममाहात्म्य ॥*
जोषीला सब जोईला, कोइ नाँव समानि न होईला ॥टेक॥
अठसठि तीरथ बेद पुराणा, तुलै नहीं कोइ नाँउ समाना ।
नेम धरम सब जप तप भैला । नाँव समानि कोइ हुवा न व्हैला ॥
दान पुंनि करि तुला बईठा, नाँव समानि कोइ तुलत न दीठा ॥
नीखँड पिरथी जोषी जोई, बषनां नहीं बराबरि होई ॥१०२॥
जोषीला = हे साधकों ! (जोषीला ‘जोशी’= ब्राह्मण का वाचक भी अर्थ किया जा सकता है । वस्तुतः यहाँ “जोषीला” शब्द ‘जोशी’ के लिये अश्रद्धास्पद भाव से आया है । जैसे ‘जोगी’ को ‘जोगीड़ा’ कहने में अश्रद्धा का भाव दर्शित हुआ करता है ।) हमने सब को तौल लिया है, देख डाला है, पढ़ डाला है, सुन लिया है; भगवन्नाम के बराबर अन्य दूसरा कोई भी भगवत्प्राप्ति का सरल, सुगम, निरापद व बिना लागत ही सध जाने वाला साधन नहीं हो सकता है ।
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अड़सठ तीर्थों में जाकर स्नान करने से अर्जित पुण्य, वेद-पुराणादि का स्वाध्याय, श्रवण; कोई भी भगवन्नाम के बराबर तौलने पर तुल नहीं पाते हैं । नियम, धर्म = पुण्य, सकाम-जप, तप सभी भेला = मिलकर आज तक न तो भगवन्नाम के बराबर हुए हैं और न भविष्य में होंगे ही । पण्ढरपुर में एक दानवीर श्रेष्ठिवर्य अपरिमित दान पुण्य करके तुला के एक पलड़े में यह कहकर बैठा कि यदि मैंने अपरिमित मात्रा में दान पुण्य किया है तो मेरा पलड़ा तुलसी पर लिखे राम-नाम युक्त एक पत्ते से भारी हो जाए किन्तु उस एक पत्ते पर लिखे राम-नाम के बराबर उस दान-पुण्य को तुलते हुए नहीं देखा गया । अर्थात् नाम का पलड़ा ही भारी रहा ।
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कार्तिकेयस्वामी नौखंड पृथिवी नाप कर = घूमकर आये जबकि गणेश कहीं पर भी न जाकर माता-पिता के समक्ष राम शब्द पृथिवी पर लिखकर उसी की परिक्रमा करके आ गये जिससे गणेश को ही जीता हुआ मान लिया गया । क्योंकि नवखंडात्मक पूरी पृथिवी राम-नाम में समाहित है और गणेशजी ने रामनाम की परिक्रमा करके नवखंडात्मक पृथिवी की परिक्रमा एक क्षण मात्र में कर ली । अथवा बषनां कहता है, जोषी, जोई = पूरी नवखंडात्मक पृथिवी को तौल व देख डाल किन्तु नाम के बराबर वह भी नहीं हो सकेगी । राम नाम इससे भी बड़ा महान्, प्रभावशाली है ॥१०२॥

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