सोमवार, 27 अप्रैल 2026

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ४८/५०

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ४८/५०
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बुद्धि हीन अति बावरौ, देह रूप ह्वै जाइ । 
सुन्दर चेतनता गई, जडता रही समाइ ॥४८॥
देहाभिमानी आत्मा का देह यदि मूर्ख है या पागल है तो वह आत्मा स्वयं को भी मूर्ख एवं पागल मानने लगता है । ऐसी स्थिति में यही समझना चाहिये कि उस आत्मा का स्वरूप(चेतनता) नष्ट हो गया है तथा देह की जडता उस को आवृत कर चुकी है ॥४८॥
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स्याणौ घर मांहे कहै, हूं अपने घर जांउं । 
सुन्दर भ्रम ऐसौ भयौ, भूलौ अपनौ ठांउं ॥४९॥
यदि कोई उन्मत्त पुरुष, घर में बैठा हुआ भी कहे कि मैं घर जाना चाहता हूँ, यह बात तो समझ में आने योग्य है; परन्तु आश्चर्य तब होता है जब कोई सयाना(सावधान) पुरुष भी यही कहे । आज भ्रमात्मक स्थिति के कारण आत्मा की यही दशा हो गयी है कि वह स्वस्थिति को ही भूल गया है ! ॥४९॥
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रवि रवि कौं ढूंढत फिरै, चंद हि ढूंढै चंद । 
सुन्दर हूवो जीव सौं, आप इहै गोबिंद ॥५०॥
इति स्वरूप विस्मरण कौ अंग ॥२३॥
लोक में यहीं देखा जाता है कि प्रत्येक प्राणी अपने समानस्थितिक(समानधर्मा) को ही खोजता है । सूर्य सूर्य जैसे तेजस्वी को ही खोजता है तो चन्द्रमा अपने जैसे शीतल को ही खोजता है । इसी प्रकार आत्मा को अपने समानधर्मा ब्रह्म की ही खोज करनी चाहिये, तब वह गोविन्दस्वरूप(ईश्वर = ब्रह्म) हो पायगा ॥५०॥
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इति स्वरूपविस्मरण का अंग सम्पन्न ॥२३॥
(क्रमशः) 

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