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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ४५/४७
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देह आपकौ जानि करि, ब्राह्मन क्षत्रिय होइ ।
वैश्य सूद्र सुन्दर भयौ, अपनी सुधि बुधि खोइ ॥४५॥
वह आत्मा देहाभिमान करता हुआ, अपनी सुध बुध खो कर, कभी अपने को ब्राह्मण कहता है और कभी क्षत्रिय । वही कभी अपने आप को वैश्य तो कभी शूद्र मानने लगता है ॥४५॥
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देह पुष्ट ह्वै दूबरी, लगै देह कौं घाव ।
चेतनि मांनै आपु कौं, सुन्दर कौंन सुभाव ॥४६॥
देहाभिमानी उस आत्मा की देह कभी किसी कारण से पुष्ट हो जाती है, या कभी दुर्बल । कभी उस देह को किसी कारण से कोई आघात लग जाता है । वह चेतन आत्मा, देहाभिमान के कारण, देह के इस उतार चढाव(हानि या वृद्धि) को अपना मान बैठता है ॥४६॥
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देह बाल अरु बृद्ध ह्वै, जोबनि ह्वै पुनि देह ।
सुन्दर मानैं आपु कौं, देखहु अचिरज येह ॥४७॥
बाल्यावस्था, वृद्धावस्था या युवावस्था स्वभावतः देह में आती रहती है । वह देहाभिमानी आत्मा इन अवस्थाओं को अपने में मानने लगता है । यही आश्चर्य की बात है ! ॥४७॥
(क्रमशः)

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