रविवार, 26 अप्रैल 2026

खालिक यूँ न खुसी होइ ।

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*आये एकंकार सब, साँई दिये पठाइ ।*
*आदि अंत सब एक है, दादू सहज समाइ ॥*
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*उपदेश ॥*
खालिक यूँ न खुसी होइ ।
इन पंचौं को फैलाइ देकरि, इहि नींदड़ी न सोइ ॥टेक॥
मांहैं मुहकम मीयां मिसमिला, औरैं करद न लाइ ।
हसेब हासिल कवल करदाँ, ज्वाब देणाँ जाइ ॥
बोलते का बरण कैसा, चालि तूँ चलि जाइ ।
सब जोति उसकी जुल्म न कीजै, साहिब सही रिसाइ ॥
दूइ दरोगाँ गुसा हरामा, दूरि करि यहु ज्ञाना ।
अजाब अंति बिसियार व्हैगा, मानि मूसलमाना ॥
तरस तोबा कौफ करणाँ, हरदम नाँव् हजूरि ।
 
खालिक = परमात्मा । खलक = जगत् । पंचौं = शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध । मुहकम = शत्रु, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्यादि । मींया = मन । मिसमिला = बिस्मिल्लाह = शुरुआत । करद = छुरी । हसेब = हिसाब । कवल = कौल = करार = प्रतिज्ञा “गरभ कौल काठा किया, जीव दान दे मुज्झ । आठ पहर चौसठ घड़ी, साँई सुमरूँ तुज्झ ॥“ हासिल = बसूल करेगा; करेगा । दुइ = द्वैत । गुसा = क्रोध । हरामा = हराम हैं, नहीं करना चाहिये क्योंकि करना बुरा है । दरोगाँ = असत्य, झूठ । तरस = दया । तोबा = पश्चाताप । कौफ = डर । हजूरि = उपस्थित, संलग्न । बिसियार = प्रचुर मात्रा में । अजाब = शोक, दुःख (?)। 
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बषनांजी मुसलमानों के मिस समस्त उन मनुष्यों को समझाते हैं जो दुराचरण, दुर्गुणों के शिकंजों में फँसे हुए हैं । वे कहते हैं, हे मनुष्य ! परमात्मा उस आचरण से प्रसन्न नहीं होता, जैसा तू कर रहा है । अतः पंच विषयों में अपने आपको, फैलाई देकरि = आकंठ डुबोकर अज्ञान रूपी निद्रा में निश्चिंत होकर मत सो । तू  भीतरी मुहकम = रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्दात्मक पंचविषयों को प्राप्त करने के लिये औरौं की गर्दन पर छुरी मत चला, औरौं का अहित मत कर । 
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मैं कहता हूँ कि तू अन्यों को मत मार अपितु स्वयं के भीतर ही विद्यमान काम, क्रोधादि अनेक शत्रुओं को मार । तूने जन्म लेने के पूर्व माता के गर्भ में परमपिता परमेश्वर से उसका भजन करने की प्रतिज्ञा की थी किन्तु संसार में आकर तू उस प्रतिज्ञा को भूल गया तथा करदाँ = छुरी से जीवों का कत्ल करने लग गया । परमात्मा इन सभी का हिसाब लेगा । अथवा मरने वाला जीव अगले जन्म में मारक बनकर तुझको मारकर हिसाब चुकता करेगा । धर्मराज के यहाँ प्रत्येक कृत्य का हिसाब देना पड़ता है ।
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शरीर में जो बोलने, चलने वाली आत्मा है उसका वर्ण कौनसा है ?” 
“रूप बरण कैसौ तड़का कौ । असौ कहा बखाणौं जाकौ ॥” (एक हाथ से दूसरे हाथ पर चोट करने को तड़का मारना कहा जाता है । स्वामी रामचरण कहते हैं, तड़के का न रूप है और न वर्ण है । उस जैसा और है भी क्या कि जिसकी उपमा दी जाये । वस्तुतः आत्मा, ब्रह्म रूप, वर्ण, लिंग, वचन सभी से अतीत है । उसे इदमित्थं कह पाना असंभव है । 
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“राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी ॥ 
मत हमार अस सुनहूँ सयानी । 
धर्मराज के यहाँ प्रत्येक कृत्य का हिसाब देना पड़ता है ।”  
“राम अगोचर बुद्धि मन, अविगत अकथ अपार । 
नेति नेति नित निगम कह ॥”  
“इदमित्थं कहि जाइ न सोई ॥”  मानस ॥) 
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अर्थात् उसका कोई भी वर्ण = जाति नहीं है । वह तो लिंग व वर्ण से अतीत है । फिर क्यों ऊपरी शरीर के कारण भेद मानकर अन्यों को मारता है । अरे ! एक दिन तुझे भी तो चले जाना है । जितने भी जीव संसार में हैं, वे सभी उसी एक परमात्मा की ज्योति हैं । अतः उन पर जुल्म मत कर ।  उन्हें सता भी मत तो मार भी मत । यदि तू मारेगा तो निश्चय ही परमात्मा तेरे ऊपर नाराज होगा । द्वैत भ्रम है(दुइ दरोगाँ) “द्वितीयाद्वै भयं भवति ।” गुस्सा करना हराम है । इनको दूर करना ही ज्ञान है । 
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अतः इन्हें तत्काल दूर कर दे । हे मुसलमान ! हे मोमिन ! हे पवित्रात्मा ! यदि तू उक्त बातों को नहीं मानेगा तो अंत में तुझे बेजा अजार = दुःख उठाने पड़ेंगे । तरस = दया, तौबा = पश्चाताप (गलती होने पर गल्ती का अहसास करके भविष्य में पुनः न करने का दृढ संकल्प), कौफ = डर (परमात्मा से सदा डर कर रहना कि वह अनंत आंखों वाला है । 
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मैं जो जैसा भी जहाँ-कहाँ करता हूँ, उन सभी को वह देखता है तथा अंत में उन सभी का मुझे वह फल देगा । “दो बातन कौं भूल मति, जो चाहै कल्याण । ‘नारायन’ इक मौत कौ दूजै श्री भगवान ॥” इनको करना चाहिये । साथ ही हरदम भगवन्नाम जप में संलग्न रहना चाहिये । जो मेरे द्वारा बताये गये उक्त विचारों के अनुसार आचरण करते हैं उनसे बषनां कहता है कि उनसे परमात्मा बिल्कुल भी दूर नहीं है । अर्थात् परमात्मा उनमें ही निवास करता है  ॥१००॥ 

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