मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

नाँव हरी का प्यारा रे ।

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दुख दरिया संसार है, सुख का सागर राम ।*
*सुख सागर चलि जाइए, दादू तज बेकाम ॥*
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*नाममाहात्म्य ॥*
नाँव हरी का प्यारा रे । जासौं लागा हेत हमारा रे ॥टेक॥
जैसे माँखी कौं गुड़ मीठा । जिसा पतंगै दीपक दीठा ॥
जैस चंद कमोदनि प्यारा । तैसा हरि सौं हेत हमारा ॥
ज्यूँ कीड़ी कण सांच्या भावै । सीप स्वाति जल ऊपरि आवै ॥
चंदनि चील न होई न्यारा । यौं बषनां कै राम पियारा ॥१०४॥
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परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा का नाम प्यारा = अखंडानंद स्वरूप है (रामजी और रामजी का नाम दो नहीं, एक ही तत्त्व है । रामजी अखंडानंद स्वरूप होने से उसका नाम भी अखंडानंद स्वरूप है और इसलिये वह भक्तों को प्यारा, रुचिकर है ।) जिससे हमें प्रेम हो गया है, जिससे हमारा अनन्य-अनुराग हो गया है ।
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हमारा परमात्म-नाम के प्रति अनुराग ठिक वैसा ही एकान्तिकी है जैसा मक्खी का मीठे गुड़ से, पतंगे का दीपक की लौ से, कुमुदनी का चंद्रमा की किरणों से होता है । बषनां को राम-नाम ठीक वैसे ही प्रिय है जैसे चींटी कण = अन्न, मिष्ठान को संचय करने के लिये सदैव प्रयत्नशील रहती है, स्वाति नक्षत्र के जल को ग्रहण करने के लिये सीपी समुद्र के नीचे से ऊपर आती है और चील = सर्प चंदन के वृक्ष से अलग नहीं होता है ॥१०४॥

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