शनिवार, 18 अप्रैल 2026

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग १७/२०

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग १७/२०
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जे गुन उपजै देह कौं, सुख दुख बहु संताप । 
सुन्दर ऐसौ भ्रम भयौ, ते सब मांनै आप ॥१७॥
सुख दुःख आदि सन्तापदायक कष्ट देह को होते हैं; यह जीवात्मा भ्रम में पड़ कर उन सब कष्टों को अपना मान बैठा है ॥१७॥
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शीत उष्ण क्षुधा तृषा, मोकौं लागी आइ । 
सुन्दर या भ्रम की नदी, ताही मैं बहि जाइ ॥१८॥
वह समझता है कि ये शीत उष्ण, क्षुधा तृषा(भूख प्यास) मुझ(आत्मा) को लग रहे हैं । यह तो भ्रम की नदी है, जिस में आज यह जीवात्मा बहा जा रहा है ॥१८॥
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अंध बधिर गूंगौ भयौ, मेरौ कौंन हवाल । 
सुन्दर ऐसौ मांनि करि, बहुत फिरै बेहाल ॥१९॥
वह इस भ्रमनदी में बहता हुआ यही सोच रहा है कि अब मेरी क्या गति होगी ! ऐसा सोचते हुए उस को न इस नदी के पार जाने का कोई उपाय सूझ(दीख) रहा है, न उसे दूसरों(गुरु आदि) का हितोपदेश ही सुनायी दे रहा है, और न वह अपनी व्यथा कथा ही किसी अन्य हितचिन्तक को कह पा रहा है । इस प्रकार वह अन्धा, बहरा एवं गूंगा होकर अपने लिये व्यथित हो रहा है ॥१९॥
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मिलि करि या जड देह सौं, रह्यौ तिसौ ही होइ । 
सुन्दर भूलौ आपु कौं, सुधि बुधि रही न कोइ ॥२०॥
यह जीवात्मा इस जडप्रकृतिक देह से सम्पृक्त होकर स्वयं भी जड होकर रह गया है । इस स्थिति में इसको स्वकीय वास्तविक रूप की कोई सुध बुध(होश = चेतना) नहीं रह गयी है ॥२०॥
(क्रमशः)

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