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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*भरी अधौड़ी भावठी, बैठा पेट फुलाइ ।*
*दादू शूकर स्वान ज्यों, ज्यों आवै त्यों खाइ ॥*
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*स्वार्थ-परमार्थ ॥*
स्वारथ लागै घी गुड़ मीठौ । और जनम कहु कौंनैं दीठौ ॥टेक॥
स्वारथि कारणि अनरथ कीजै । दई दोस किसा कौ दीजै ॥
सदा रहै स्वारथ के पासै । परमारथ थैं अलगौ नासै ॥
पाप पुंनि की कौंण चलावै । जे खुरदा चहुँ की घर मैं आवै ॥
मंछ गिलगिलिया जुग मांही । परमेसुर कौ को डर नांहीं ॥
बषनां स्वारथ मैं सह लोई । परमारथ मैं बिरला कोई ॥१०८॥
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चार्वाक मतानुयायियों की खरी आलोचना इस पद में की गई है । चार्वाकों का कथन है .....
“यावज्जीवेत्सुखंजीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत् ।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥”
(सर्वदर्शन संग्रह श्लोकांक १८)
जो देह भस्मीभूत हो जाती है उसका पुनरागमन फल भोगने के लिये क्यों कर हो सकता है । अतः इसी जन्म में जो भी खाना, पीना, मौज-मस्ती करनी हो वह कर लेनी चाहिये । यदि मौज-मस्ती के लिये हाथ में पैसा न भी हो तो कोई बात नहीं, ऋण लेकर ही घी, दूध खाना चाहिये क्योंकि मरने के बाद चुकाने की कोई आवश्यकता नहीं है । इन्हीं विचारों को प्रकारान्तर से बषनांजी कहते हैं ।
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स्वारथ = शरीर पोषणार्थ घी, गुड़ खाना रुचिकर लगता है । खाने वाले कहते हैं, अन्य जन्म किसने देखा है, जो खाना-पीना है, वह इसी जन्म में खा पी लो, मौज मस्ती कर लो । जिसको हमने देखा नहीं, उसके पीछे पड़कर क्यों हम हमारी मौज मस्ती को छोड़ें । इस प्रकार की सोच वालों के संबंध में बषनांजी कहते हैं, स्वार्थ के कारण तो अनर्थ करते हैं, दुराचरण, हिंसा, कपट, पाखंड करते हैं ।
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फिर बताइये ! ये लोग कैसे विधाता को दोष दे सकते हैं जैसा कि प्रायः लोगों को दोष देते हुए देखा गया है
“सो परत्र दुख पावहीं, सर धुनि धुनि पछिताहिं ।
कालहि कर्महि ईश्वरहि, मिथ्या दोष लगाहिं ॥”
वस्तुतः ये लोग सदा ही स्वार्थांध हुए रहते हैं । परमार्थ से सर्वथा अलग रहते हैं । समय पड़ने पर उसकी आलोचना भी कर डालते हैं ? इनके लिये पाप और पुण्य का कोई महत्त्व नहीं है ।
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राह, बेराह, उचित-अनुचित जिस भी रास्ते से धन मिलता है उसी को अंगीकृत करके घर में खुरदा = धन-सम्पत्ति कमा कर लाते हैं । फिर सभी घरवाले मिलकर उसका उपयोग करते हैं । जुग = पूरे जीवन भर मद्य, मांस, मछली जैसे निषिद्ध भोज्यों को खाते हैं । परमेश्वर का डर बिल्कुल ही मन में नहीं लाते हैं कि अंत में वह हमें हमारे दुष्कर्मों का दण्ड देगा । बषनां कहता है, सभी लोग स्वारथ के वशीभूत हुए हुए हैं । परमार्थ में किसी-किसी विरले की ही प्रवृत्ति है ।
“मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां तत्त्वतः”॥१०८॥

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