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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ २९/३२*
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*दुख दिनकर की दृष्टि१ करि, नेह नीर नभ जाहिं ।*
*रज्जब रमिये शून्य२ में, यही युक्ति जग माँहिं ॥२९॥*
सूर्य की किरणों१ के द्वारा ही जल आकाश में जाता है, वैसे ही भगवद्-विरह-दु:ख से ही प्राणी का प्रेम विषयों से हट कर प्रभु में जाता है । विरह द्वारा प्रकट प्रेम से ही निर्विकार२ ब्रह्म में रमण करना चाहिये । ब्रह्म से मिल कर ब्रह्मानन्द प्राप्त करने की श्रेष्ठ युक्ति जगत् में यही है ।
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*रज्जब आज्ञा अग्नि मधि१, आतम अंभ२ निकास ।*
*उलट समावे शून्य में, पंथी पंथ सु तास ॥३०॥*
जैसे गरमी पड़ने से जल२ समुद्र के मध्य१ से निकल कर आकाश में चढ़ता है, वैसे ही गुरु-उपदेश रूप आज्ञा से आत्मा रूप पथिक संसार से निकल कर सांसारिक भावनों से विपरीत विरह रूप प्रभु प्राप्ति के मार्ग द्वारा निर्विकार ब्रह्म में समाता है ।
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*विरह सूर अति गति तपै, तन मन मांड१ मझार ।*
*रज्जब निकसे राम जल, विरहा के उपकार ॥३१॥*
ब्रह्मांड१ में सूर्य विशेष रूप से तपता है तब समुद्र से जल निकल कर बर्षता है, वैसे ही जब भक्त का तन मन विरह से अत्यन्त व्याकुल होता है तब राम का दर्शन होता है । अत: राम का दर्शन विरह के उपकार से ही होता है ।
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*तन मन ओले ज्यों गलहिं, विरह सूर की ताप ।*
*रज्जब निपजै देखतों, यूं आपा गलि आप ॥३२॥*
जैसे सूर्य के ताप से बर्फ के पत्थर गलकर देखते देखते ही जल रूप हो जाते हैं, वैसे ही विरह-जन्य दु:ख से तन मन के अहंकारादि विकार गल जाने से देखते देखते ही आत्मज्ञान उत्पन्न होकर साधक अपने शुद्ध स्वरूप ब्रह्म को प्राप्त हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

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