सोमवार, 11 मई 2026

मेरी रे यहु मेरी रे

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*मेरी मेरी करत जग खीना, देखत ही चल जावै ।*
*काम क्रोध तृष्णा तन जालै, तातैं पार न पावै ॥*
*मूरख ममता जन्म गमावै, भूल रहे इहिं बाजी ।*
*बाजीगर को जानत नांही, जन्म गंवावै वादी ॥*
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*माया ॥*
मेरी रे यहु मेरी रे । तिहि मेरी प्रीति घणेरी रे ॥टेक॥
मेरी मेरी करतौ हार्यौ रे । मेरी राम बिसार्यौ रे ॥
मनि मेरी करि झाली रे । काहु कै संगि न चाली रे ॥ 
मेरी कौ रस चाख्यौ रे । जिहि हिरदै राम न राख्यौ रे ॥
मेरी ऊपरि मरिस्यूँ रे । तिल पाछै पाव न धरस्यूँ रे ॥
मेरी धर कारणि धारै रे । भाई कूँ भाई मारै रे ॥
मेरी जाण न देस्यूँ रे । पेटि कटारी लेस्यूँ रे ॥
मेरी मेल्हि न जास्यूँ रे । मेरी ऊपरि बिष खास्यूँ रे ॥
मेरी कौ रस मीठौ रे । बषनां जिहिं राम न दीठौ रे ॥११६॥ 
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‘यह मेरी है’. ‘यह मेरी है’, इस ‘मेरी’ से ही अत्यधिक प्रीति है, मानवमात्र की । मैं-मेरी, तू-तेरा ही माया का प्रत्यक्ष दीखने = अनुभव में आने वाला रूप है । “गो गोचर जहँ लगि मन जाई । सो सब माया जानहूँ भाई ॥“ मान-बढ़ाई, धन-दौलत माया के ही सूक्ष्म व् स्थूल रूप हैं । इन्हीं ने जागतिक प्राणियों को अपने चंगुल में उलझा रखा है । 
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जब तक मानव का इनसे रागात्मका सम्बन्ध विच्छेद नहीं होता तब तक परमात्मवबोध असंभव है । इन्हीं बातों को बषनां जी इस पद में व्याख्यायित कर रहे हैं । जीव सदैव यह मेरी है, यह मेरी है ही कहता रहता । उसने इस मेरी से ही प्रितिप्रिती अत्यधिक मात्रा में कर रखी है । मेरी-मेरी करता-करता ही एकदिन मनुष्य मरने के कगार पर पहुँचता जाता है किन्तु मेरी-मेरी से उसका पीछा छूटता नहीं है । 
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वह मेरी, मेरी से हार जाता है । परिणामस्वरूप इस मेरी-मेरी के कारण स्वस्वरूप परब्रह्म-परमात्मा-राम को भूल जाता है । मन ने सांसारिक माया-धन-संपति, विषय-भोगों को मेरे-मेरे करकर दृढ़ता के साथ पकड़ रखे हैं । उन्हें छोड़ता नहीं है । किन्तु यह माया, धन, सम्पति, विषय-भोग साथ में किसी के आज तक गये नहीं हैं । 
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जिसने इस माया का मेरी है, मेरी है करके रस चाखा है, उसने कभी भी रामजी को अपने हृदय में धारण नहीं किया है । जीव इस माय में इतना अधिक आसक्त हो जाता है कि यदि कोई उससे रंचमात्र भी लेना चाहे तो वह कहता है, यह मेरी है । यदि तुम मेरे से इसे छीन लोगे तो मैं इसके ऊपर मर जाऊंगा इसके बिना जी नहीं सकूंगा । मैं इसको तुमसे बचा लेने में तिलमात्र भी कोर-कसर नहीं छोडूंगा । राणसंग्राम में बराबरी से लडूंगा । एक पाव भी पीछे नहीं हटूंगा । इस धरती को मेरी-मेरी करके अपनी-अपनी मानते हैं और भाई से भाई लड़ता है कि यह मेरी है । 
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इस प्रकार यह मेरी धरती है । मैं इसमें से रंचमात्र भी तेरे अधिकार में न जाने दूंगा । कदाचित् चली जायेगी या तू जबरदस्ती लेने का प्रयत्न करेगा तो मैं पेट में कटारी भौंक कर मर जाऊंगा । तेरे माथे मेरी हत्या का इल्जाम व पाप आयेगा । यह संपत्ति मेरी है । मैं इसे यहाँ मेल्हि = ऐसे ही रखकर नहीं जा सकता । कदाचित तुम मेरे से इसे यही छोड़ जाने के लिये तो मैं जहर खाकर प्राण त्याग दूंगा । जिसने एक बर इस मेरी रूपी माया का रस मीठा मानकर चख लिया है उसे कभी भी रामजी में बारे में विचार करने की सूझती ही नहीं है । उसे कभी भी रामजी का साक्षात्कार नहीं होता है ॥११६॥ 

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