*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२०. सुमिरण का अंग ~४५/४८*
.
*सब ठाहर सु उपाधि है, सुमिरन में सु समाध ।*
*रज्जब सु गुरु प्रसाद सौं, सो ठाहर लाध ॥४५॥*
सभी सांसारिक व्यवहार रूप स्थानों में नाना प्रकार की उपाधियाँ भासती हैं, किन्तु हरि स्मरण में स्थित रहने से समाधि होकर परम सुख प्राप्त होता है, अत: गुरु के कृपा प्रसाद से उस हरि स्मरण रूप स्थान में ही सुख मिलता है ।
.
*सुमिरण सितिया१ पीजिये, तो नख शिख शीतल होय ।*
*दूजी ठाहर दहणि२ सब, रज्जब देखो जोय ॥४६॥*
हरि-स्मरण रूप मिश्री१ का पान करोगे, तो तुम्हारे शरीर में नख से शिख पय्यर्न्त शीतलता का अनुभव होगा । अन्य सांसारिक व्यवहार रूप स्थानों में तो सब प्रकार जलन२ ही होती है । यह तुम स्वंय ही अनुभव करके देख सकते हो ।
.
*सुमिरण शहद सु पीजिये, प्राण पिंड द्वे पौष ।*
*रज्जब रोग कहां रहे, भागे अंतर दोष ॥४७॥*
हरि-स्मरण रूप शहद को पीना चाहिये, इससे सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर दोनों का पोषण होता है । जब उक्त औषधि से भीतर का दोष नष्ट हो जाता है, तब रोग कहां रहता है ?
.
*सुख अनन्त हरि नाम में, जाका वार न पार ।*
*जन रज्जब आनन्द ह्वै, सुमिर्यों सिरजन हार ॥४८॥*
हरि-नाम-स्मरण रूप साधन में स्थित रहने से हमें जिसका आदि अन्त भी नहीं ज्ञात होता है ऐसा अनन्त सुख प्राप्त होता है । सृष्टिकर्त्ता ईश्वर का स्मरण करने से सभी को सदा आनन्द ही होता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें