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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू माया फोड़े नैन दोइ, राम न सूझै काल ।*
*साधु पुकारैं मेरू चढ़, देखि अग्नि की झाल ॥*
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माया ॥
देखी मैं डाकणि जरख चढ़ी ॥
लेबे का छोडण का नांहीं, कोई अैसौ मंत्र पढ़ी ॥टेक॥
पाँच बीर जाकै सँगि डोलै, सब जोगणि मनि भावै ।
नगिन भई चढिबा कै कारणि, बन में जरख बुलावै ॥
लापसड़ी का लौंदा करि करि, आपण खाइ खुलावै ।
जब यहु लोग सहर कौ सोवै, तबै सिराड़ा ध्यावै ॥
पाड़ोसणि पणि हाँतैं आई, संगि मिली गटकावै ।
भूखी व्है तबहीं भख मांगै, मुवा मसाण जगावै ॥
बहुत सयाणें पचि पचि हारे, कोई मंत्र न लागै ।
जाली जलै न जल मैं बूडै, नीसरि नीसरि भागै ॥
टूनर मंत्र सोकोत्री का सब, हरि कै भजनि उडावै ।
बषनां अैसा गुरु हमारा, डाकणि लियाँ छुडावै ॥१६४॥
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स्वामी श्रीरामचरण ने कहा है,
‘मलिन मंत्र कौ पाठ पढि, जरख बुलावै बाम ।
रामचरण साचै सबद, क्यूँ नहिं आवै राम ॥’
इसीप्रकार के विचार बषनांजी डाकण के रूपक से प्रकट करते हुए कहते हैं । मैंने वासना रूपी जरख पर माया रूपी डाकण को चढे हुए देखा है । यह लेने ही लेने का काम करती है, देने का काम ही नहीं करती है । इसने कोई इसीतरह की शिक्षा अपने गुरु से सीखी है ।
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शब्द, स्पर्श, रूप, रस व गंध रूपी पाँच वीर इसके साथ सदैव घूमते रहते हैं जो सभी इन्द्रियों रूपी योगिनियों को रुचिकर लगते हैं । यह सत्यासत्य विचार रूपी कपड़ों को उतार कर जरख पर चढ़ने कर लिये नग्न हो जाती है और एकांत वन में जाकर वासना रूपी जरख को बुलाती है । विषयभोग रूपी लापसी के बड़े-बड़े ग्रास बनाकर यह स्वयं भी खाती है तथा अपने सहयोगी जरख तथा योगिनियों को भी खिलाती है ।
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जब शहर की जनता अज्ञान रूपी निद्रा में सोयी पड़ी रहती है तब यह अपना प्रभाव सिराड़ा = शीघ्रगति से प्रकट करती है । मनसा रूपी पड़ोसन के जब हाँतैं = कहीं से भोजन आती है तब उसके साथ बैठकर प्रसन्नता पूर्वक उस विषयभोग रूपी भोजन खाती है । जब यह भूखी होती है तब ही वलि मांगती है और शमशान में जाकर मृत बच्चों को जीवित करके खाती है ।
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बहुत से सयाने भोपे रूपी ज्ञानी-ध्यानी इससे बच निकलने के लिये प्रयत्न कर-करके हार गये किन्तु उनका कोई भी मंत्र = उपाय इसको वश में नहीं कर सका । यह जलाने पर जलती नहीं तथा जल में डुबाने से डूबती भी नहीं है । दोनों में से ही निकल-निकल कर बाहर आ जाती है । इस सोकोत्री = शोक देने वाली माया रूपी डाकण के समस्त जादू टोने और मंत्र परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा हरि के भजन से प्रभावहीन हो जाते हैं । बषनां कहता है, मेरा गुरु ऐसा है, जो डाकण द्वारा वशीकृत मनुष्य को डाकण के चंगुल से छुड़ा देता है ॥१६४॥

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