बुधवार, 1 जुलाई 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~६१/६४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~६१/६४*
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*निर्भय प्राणी नाम में, सौ भूले भय पूरि ।*
*ज्यों रज्जब सुख मीन जल, दुख दीरघ जब दूरि ॥६१॥*
जैसे मछली जल में सुखी रहती है और जल दूर होते ही महान् दुख में पड़ जाती है, वैसे ही हरि-नाम-स्मरण रूप साधन में स्थित रहने से प्राणी निर्भय रहता है और नाम भूलने से अत्याधिक भय प्राप्त होता है ।
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*रज्जब नाम निरंजन नीर है, महा मुनी मन मीन ।*
*सुख सागर माँही सुखी, दुख दीरघ जब भीन१ ॥६२॥*
निरंजन ब्रह्म का नाम रूप जल है, और महा मुनीश्वरो के मन मच्छियाँ है । जैसे मच्छियाँ सागर में सुखी रहती है, वैसे ही मुनियों के मन ब्रह्मानन्द में सुखी रहते हैं मच्छी जल से और मुनि-मन निरंजन के नाम से अलग१ होते ही महान् दुख में पड़ जाते हैं ।
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*नाम नेह सेती भजे, तो कोइ गुण व्यापे नाँहिं ।*
*पै हरि सुमिरण हेत बिन, तो द्वन्द्व हि दग्धे माँहिं ॥६३॥*
यदि प्रेम से हरि नाम का स्मरण किया जाय तो हृदय में कामादि में से कोई भी गुण व्याप्त होकर व्यथित नहीं करता और यदि हरि-स्मरण बिना प्रेम किया जायगा, तो अवश्य हृदय को काम क्रोधादि द्वन्द्व जलायेगा ।
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*नाज नाम की एक गति, पानी प्रेम सु पोष ।*
*इन दोनों के दोय बिन, रज्जब रवि गुण दोष ॥६४॥*
नाज और नाम की एक-सी ही रीति है, नाज का पोषण पानी से और नाम का प्रेम से होता है । नाज और नाम इन दोनों के जल और प्रेम के बिना सूर्य और गुण दोष रूप हो जाते हैं । बिना पानी नाज सूर्य की ताप से जल जाता है और बिना प्रेम नाम का शास्त्र कथित फल नहीं होता ।
(क्रमशः)

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