🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
२८. आत्म अनुभव कौ अंग २१/२४
.
बुद्धि हु पहुंचि सकै नहीं, करै दूरि लग दौर ।
सुन्दर ऐसौ आतमा, पहुंचि सकै क्यौं और ॥२१॥
उस को जानने में किसी की बुद्धि भी समर्थ नहीं, भले ही वह कितना भी श्रम क्यों न करे ! जब वह आत्मज्ञान इतना दुर्गम(दुर्बोध) है तो उस तक जनसामान्य की पहुँच कैसे हो सकती है ! ॥२१॥
.
शब्द तहाँ पहुंचै नहीं, बहु बिधि करै बखांन ।
सुन्दर ऐसौ आतमा, अनुभव होइ प्रमांन ॥२२॥
उस तक न किसी शब्द की पहुँच(गति) हो सकती है, भले ही कोई उस(आत्मा) के विषय में कितना ही बोलता रहे । ऐसे आत्मज्ञान के लिये किसी ज्ञानी के केवल ज्ञान की ही पहुँच हो सकती है । इस ज्ञानी का अनुभवज्ञान ही इसके वर्णन में सहायक हो सकता है ॥२२॥
.
बेद कह्यौ बहु भांति करि, शास्त्र कही बहु युक्ति ।
सुन्दर स्मृति पुरान पुनि, कही बहुत बिधि उक्ति ॥२३॥
चारों वेद, अठारहों पुराण, छहों शास्त्र या सभी स्मृतियाँ, कितनी भी युक्तियों के साथ, इस आत्मा के वर्णन का प्रयत्न करें ॥२३॥
.
क्यौं ही कर्यौ न जात है, ब्योम माहिं चित्रांम ।
सुन्दर कहि कहि सब थके, है अनुभव विश्रांम ॥२४॥
परन्तु ये सब मिल कर भी उस आत्मा के यथातथ वर्णन करने में उसी प्रकार थककर एक और बैठ जाते हैं, जिस प्रकार आकाश में चित्र बनाने वाला अन्त में श्रान्त हो(थक) कर एक ओर बैठ जाता है । इसमें तो किसी ज्ञानी का अनुभव ही सफल हो पाता है ॥२४॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें