बुधवार, 1 जुलाई 2026

सुसंगति-कुसंगति

🪷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🪷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू जिसका दर्पण ऊजला, सो दर्शन देखै मांहि ।*
*जिस की मैली आरसी, सो मुख देखै नांहि ॥*
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सुसंगति-कुसंगति ॥ साषी लापचारी ॥
मनसा डाकणि मन जरख, दौड़ावै दिन राति ।
बषनां कदे न ऊतरै, साँझ जिसी परभाति ॥१
(१ इसका अर्थ ‘मन कौ अंग’ की साषियों में देखे ।)
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पद ॥
आसरड़ी ऊजली रे, तामैं मुखड़ौ दीठौ जाइ ।
जिहि की मैंली आरसी, काट रह्यौ तिहि छाइ ॥टेक॥
काम क्रोध का मोरचा, भरम करम कौ काट ।
आसरड़ी दीठौ नहीं, कबहुँ सिकलीगर कौ हाट ॥
कारीगर सतगुर मिलै, सबद मसकला लाइ ।
आतम कीन्हों ऊजली, तामैं निर्मल दरसन थाइ ॥
एक तवा एक आरसी, ऊह बहन उह बीर ।
उह कुसंगति थैं काली हुवौ, उह कौ निर्मल देखि सरीर ।
एकहि आरणि नीपना, एकहि घड़्या लुहारि ।
दून्यूँ एकै लोह का, बषनां देखि बिचारि ॥१६५॥
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जो आसरड़ी = मन रूपी दर्पण उज्जवल होता है उसमें आत्मा रूपी मुख स्पष्ट रूप से दीखता है । इसके विपरीत जिसका मन पाप रूपी मैल से मलिन है, उसको आत्मदर्शन में काट = जंक रूपी प्रतिबंधक बाधा पहुँचाता है । मन रूपी दर्पण पर काम क्रोधादि का जंक(मोरचा) है । भ्रम और कर्मादि का काट है ।
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क्योंकि ऐसे मन वाले साधकों ने कभी भी गुरु रूपी सिकलीगर की हाट को जाकर देखा तक नहीं है कि जिससे उनके मनों में विद्यमान काम क्रोध, भ्रम, कर्म रूपी जंक हट जाता है । सर्वप्रथम जीव को गुरु रूपी कारीगर = सिकलीगर मिले । वह राम-नाम रटने का उपदेश देवे । जीव राम-राम रटन रूपी रगड़(मसकला) मन रूपी दर्पण पर लगावे । तब कहीं जाकर आत्मा उज्जवल = निर्मल होती है ।
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जो साधक उक्त प्रकार से मन को निर्मल करते हैं, उनको उस निर्मल मन में आत्मस्वरूप परमात्मा का निर्द्वंद्व दर्शन होता है । एक तवा होता है । एक दर्पण होता है । तवा भाई है । दर्पण बहिन है । तवा कुसंगति से काला हो जाता है जबकी सुसंगति से दर्पण निर्मल का निर्मल ही रहता है । दोनों एक ही ऐरण पर तैयार होते हैं । उन दोनों को एक लुहार बनाता है । दोनों में लगी हुई धातु लोहा भी एक ही होता है । फिर भी सुसंगति तथा कुसंगति के कारण दोनों में जमीन आसमान का अंतर पड़ जाता है । बषनां कहता है, जीव को विचार करना चाहिये कि क्या विधेय है तथा क्या निषिद्ध है ॥१६५॥

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