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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*साभार सौजन्य ~ “श्रीमद् दादू पंथ प्रकाश”
*श्रीमद्दादूपीठाधीश्वर (१९)श्री हरिरामजी महाराज का संक्षिप्त जीवन दर्शन~*
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पंथ में दीक्षा ~
आपका जन्म भोजपुरा(जोबनेर, जयपुर) ग्राम में ब्राह्मण कुल में हुआ । बाल्यकाल से ही “श्रीदादूद्वारा नारायना” के महान् संत श्री भूरादास जी स्वामी(खालसा) से आपने दीक्षा ली और अक्षराभ्यास के साथ प्राथमिक शिक्षा व संताश्रम के नियमानुसार सदाचरण तथा श्री दादूवाणी व अन्यान्य सन्त कृत्तियों से अपने अध्ययन को प्रारंभ किया ।
विद्याध्ययन ~
किशोरवस्था में आपको दादू समाज के सर्वोच्च गुरुकुल श्रीदादूमहाविद्यालय, जयपुर में शिक्षार्थ प्रवेश दिया और कुछ समय महाविद्यालय छात्रावास में रहते हए वहीं पूज्य त्यागमूर्ति स्वामी मंगलदास जी महाराज के सान्निध्य में रहकर गुरुवर्य सम्माननीय पं. श्री दयाराम जी महाराज से संस्कृत शिक्षा प्राप्त करना प्रारंभ किया । तत्कालीन श्री दादपीठाधीश्वर(17) श्री रामलाल जी महाराज की विशेषकृपा व स्वयं की कहीं अन्यत्र विशिष्ट-विद्वान व मनीषी के पास विद्याध्ययन को इच्छा से इन्हें शेखावाटी-अंचल के इंडलोद नगर के संस्कृत विद्यालय में अध्ययनार्थ भेजा गया, वहां के ख्यातनाम निदान व प्रकाण्ड पण्डितवर्य पूज्य श्री रामधारी जी महाराज के द्वारा आपने संस्कृत वाङ्मय की समुचित शिक्षा ग्रहण की ।
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पुनः गुरुधाम में सेवा पूजा व अध्ययन ~
पीछे गुरुधाम श्रीदादूद्वारा नरायणा से सहसा “अतिशीघ्र लौट आने के सन्देश” से आप हत-प्रभ हुए और शीघ्र तो लौटने पर ज्ञात हुआ कि प.पू. परमकृपालु श्रीदादूपीठाधीश्वर श्री रामलालजी महाराज ब्रह्मलीन हो गये हैं । यह व्यथा-कथा उन्हें विशेष विषादकारी लगी, किंतु विधि के विधान को स्वीकार करना ही होता है ।
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यह जानकर आपने स्थान से दूर अध्ययन करने का संकल्प त्याग दिया, और गुरुधाम श्री दादूद्वारा में ही रहकर मुख्यपीठस्थ श्रीदादू मन्दिर(नारायना) हो व्यवस्था सेवापूजा तथा साथ ही स्वकीय अध्ययन-मनन का क्रम प्रारंभ किया । क्योंकि दीक्षा-गुरु प.पू. श्री भूरादास ही महाराज तो स्व. आचार्यश्री से कई वर्ष पूर्व ब्रह्मलीन हो चुके थे । अतः इनका सब प्रकार का योग-क्षेम पूर्ण आत्मीयता से.पू. आचार्य प्रवर ही करते और वे इन्हें सुयोग्य विद्वान व नैष्ठिक साधु-पुरुष बनाना चाहते थे ।
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स्वर्गीय आचार्यश्री का सारा दायित्व नव प्रतिष्ठित पू. पीठाधीश्वर(18) अनंतश्री प्रकाशदेव जी महाराज पर आ गया तो उन्होंने इन्हें पूर्ण आत्मीयता व गुरुभाई के नाते स्नेह से सेवा के साथ विद्याध्ययन के लिए प्रश्रय दिया । अतः आपने गुरुधाम में रहते हुए सत्पुरुषों की संगति से भेषभगवान् की समस्त पारंपरिक सेवाविधियों को जानकर स्वकीय अध्ययन के साथ परमगुरु श्री वजी महाराज की वाणी का दैनन्दिन पठन, विशेष अध्ययन व अनुशीलन किया और श्री दादूमन्दिर की सेवा व व्यवस्था करते हुए सच्चे ईष्ट-निष्ठ व अन्यान्य संतवाणियों तथा आध्यात्म ग्रन्थों के कुशलअध्येता व अनुभवशील संत बन गये ।
(क्रमशः)

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