सोमवार, 6 जुलाई 2026

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग २१/२४

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग २१/२४
.
सुन्दर मैं सुन्दर जगत, सुन्दर है जग मांहिं । 
जल सु तरंग तरंग जल, जल तरंग द्वै नांहिं ॥२१॥
ब्रह्म एवं जगत् की अभिन्नता : जैसे लोक में हम देखते हैं कि जल में तरंग और तरंगविकार(बुलबुला) में जल - दोनों में अभिन्नता है; वैसे ही जगत् एवं ब्रह्म की अभिन्नता समझनी चाहिये ॥२१॥ (द्र० सवैया : ३२/१४ छ०)
.
सुन्दर ब्रह्म अखंड पद, सुन्दर यह बिस्तार । 
ज्यौं सागर मैं बुद्बुदा, फेन तरंग अपार ॥२२॥
महात्मा सुन्दरदासजी इसी बात को अन्य विधि से विस्तार से कह रहे हैं - यह जगत् उस अखण्ड ब्रह्म का ही विस्तार है । जैसे कि सागर के जल में बुलबुले, फेन(झाग) तथा अपार(असीम) तरङ्गे होती हैं ॥२२॥
.
सुन्दर मैं जग देखिये, जग मैं सुन्दर सोइ । 
कुंजर मैं नारी प्रगट, नारी कुञ्जर होइ ॥२३॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जिज्ञासु को इस जगत् की सुन्दरता ब्रह्म में ही देखनी चाहिये तथा ब्रह्म की सुन्दरता को ब्रह्म में देखने का प्रयास करना चाहिये । जैसे कि मथुरा में होने वाली गोपीकुञ्जर नामक रासलीला में गोपियों में कृष्ण एवं कृष्ण में गोपियाँ दिखायी देती थी । [कहते हैं - अतिशय प्रेमवश अनेक गोपियों ने मिलकर अपने शरीरों से हाथी का आकार बना कर उस पर श्रीकृष्ण को आरूढ कराया था । इस दशा में गोपी एवं कृष्ण - दोनों ही सुन्दर(दर्शनीय) लग रहे थे । साथ ही वह गोपियों के शरीर का हस्तिमय आकार भी गोपियों से अभिन्न तथा गोपियाँ उस हाथी के आकार से अभिन्न लग रही थीं] ॥२३॥
.
जैसै बुनत महीर मैं, फुलरी परती जांहिं । 
ऐसैं सुन्दर ब्रह्म तें, जगत भिन्न कछु नांहिं ॥२४॥ 
जैसे किसी सूक्ष्म वस्त्र को बुनते समय उसमें डाले गये फूल(बेलबूटे - फुलरी) उस वस्त्र से अभिन्न लगते हैं; उसी प्रकार ब्रह्म एवं जगत् भी अभिन्न हैं ॥२४॥ (द्र० - सवैया : ३२/१८ छ०)
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें