*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२१. भजन भेद का अंग ~५/८*
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*जन रज्जब जगदीश भज, आतम के अस्थान ।*
*सुख सागर संबूह१ की, अंतर उघड़े खान ॥५॥*
जीवात्मा के आदि स्थान जगदीश्वर का भजन करना चाहिये, भजन करने से भीतर ही सर्व१ रूप सुख-समुद्र रूप ब्रह्मानन्द की खान निकल आती है ।
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*रज्जब भज भगवन्त को, तन मन भीतर पैठ ।*
*निर्मल नैनों निरख निधि, नाभि निरंतर बैठ ॥६॥*
मन को शरीर के भीतर स्थिर करके भगवान का भजन करना चाहिये, निरन्तर नाभिस्थान में वृत्ति को टिकाकर भजन द्वारा प्राप्त निर्मल ज्ञान-नेत्रों से ब्रह्म रूप निधि को देखना चाहिये ।
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*नाभि निरंतर नाम बिन, राखे भाखे नाँहिं ।*
*रज्जब सब पड़दे उठे, जाके यहु मत माँहिं ॥७॥*
जो निरंतर नाभि स्थान में नाम को रखता है, अन्य बातें न तो हृदय में रखता और नहीं कहता, ऐसा ही जिसके हृदय में निश्चय है उसके और ब्रह्म के बीच जो अविद्यादि पड़दे हैं, वे सब हट जाते हैं ।
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*नाम निरंजन लीजिये, तन मन आपो गाल ।*
*तो रज्जब रामहिं मिले, बैठे सलहिं साल ॥८॥*
तन और मन के अंहकार को नष्ट करके निरंजन ब्रह्म का नाम चिन्तन करना चाहिये, चिन्तन करने से आत्मा परमात्मा से मिल कर जैसे पिलंग के फागों में छिद्रों में लकड़ी बैठ जाती है, वैसे ही आत्मा परमात्मा दोनों एक ही हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

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