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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ३१/४४
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जगत जगत सब को कहै, जगत कहा किंहिं ठौर ।
सुन्दर यह सब ब्रह्म है, नाम धर्यौ फिरि और ॥४१॥
इस जगत् के विषय में सभी विद्वान् बहुत कुछ लिखते बोलते हैं; परन्तु यह कोई नहीं बताता कि यह जगत् है कहाँ ? अरे ! यह सब दृश्यमान पदार्थसमूह तो वस्तुतः ब्रह्म है; केवल व्यवहार के लिये लोगों ने इन पदार्थों के पृथक् पृथक् नाम रख लिये हैं ॥४१॥
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खोज करत ही जगत कौ, जगत बिलै ह्वै जाइ ।
सुन्दर यह सब ब्रह्म है, जगत कहां ठहराइ ॥४२॥
जैसे जैसे जहाँ जहाँ हम जगत् को खोजने का प्रयास करते हैं, वहाँ वहाँ से वह हमें लुप्त ही प्रतीत होता है । जिसे जिसे हम देखते हैं वह वह हमें ब्रह्म ही ज्ञात होता है, हम उसे 'जगत्' नहीं मान सकते ! ॥४२॥
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जगत कहें तें जगत है, सुन्दर रूप अनेक ।
ब्रह्म कहें तें ब्रह्म है, बस्तु बिचारें एक ॥४३॥
क्यों कि हम इन दृश्यमान पदार्थों के अनेक रूप होने के कारण इन को अनेक नामों से व्यवहृत कर लेते हैं, अतः सब इसे 'जगत्' कहने लगते हैं । वस्तुतः ये सभी पदार्थ ब्रह्ममय हैं । इसी पर यदि हम ब्रह्म की दृष्टि से यथार्थतः विचार करें तो ये सर्वथा ब्रह्ममय ही हैं ॥४३॥
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प्रगट भयौ भ्रम जगत कौ, करतें जगत बिचार ।
सुन्दर ब्रह्म बिचार तें, जगत न रह्यौ लगार ॥४४॥
जिज्ञासु साधक को, 'जगत्' पर विचार करने पर, समस्त जगत् भ्रम ही प्रतीत हुआ; परन्तु 'ब्रह्म' पर विचार करते हुए उसको ब्रह्म में जगत् का लेशमात्र भी नहीं दिखायी दिया ॥४४॥
(क्रमशः)

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