सोमवार, 6 जुलाई 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~८१/८४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~८१/८४*
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*सब सुकृत हैं, शुन्य सम, एका एक सु नाम ।*
*पृष्ट लाग दश गुण सबै, नहीं तो नाँहिं ठाँम ॥८१॥*
संपूर्ण शुभ कर्म शून्य(०) के समान हैं और अकेला हरि नाम एका(१) के समान है, जैसे एका पर अनुस्वार लगते ही १० हो जाते हैं और नहीं लगे तो कुछ नहीं, वैसे ही शुभ कर्म रूप शून्य एका की पीठ पर लग जायें अर्थात नाम स्मरण के साथ शुभ कर्म किये जायँ तो उसका दस गुण फल हो जाता है और नाम-स्मरण न करके शुभ कर्म करने से कर्त्ता को भगवद् धाम में स्थान नहीं मिलता ।
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*रज्जब भव समुद्र शिर धरी, नाम निरंजन नाव ।*
*जाया चाहे पार को, सो प्राणी चढ़ जाव ॥८२॥*
संसार -समुद्र के शिर पर राम नाम रूप नौका रक्खी है, जो प्राणी इसके पार जाना चाहे, वह इस पर चढ़ कर जा सकता है ।
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*जप जहाज जलनिधि जगत, जीव चढो कोई आय ।*
*रज्जब पारस परम गुरु, सो पद परसे जाय ॥८३॥*
राम नाम का जप ही जहाज है, उस पर चाहे कोई भी जीव चढे अर्थात जप करे, वही संसार- समुद्र से पार होकर जीव-लोह को ब्रह्मरूप सुवर्णता की प्राप्ति कराने वाले परमगुरु-पारस से मिलकर ब्रह्मरूप परमपद को प्राप्त करता है ।
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*रज्जब अज्जब देखिये, जप जगदीश जहाज ।*
*प्राणी पहुँचे पार चढ़, सरे१ सु आतम काज ॥८४॥*
जगदीश्वर के नाम का जप अद्भुत जहाज रूप देखा जाता है, प्राणी उस पर चढ़ कर अर्थात जप करके संसार-समुद्र से पार पहुँच जाता है और जीवात्मा का परब्रह्म प्राप्ति रूप कार्य सिद्ध१ हो जाता है ।
(क्रमशः)  

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