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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग २५/२८
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भूत हु भब्य हु बर्त्तते, दूजा नांहीं आंन ।
सुन्दर ज्ञानी कै सदा, कहिये केवल ज्ञांन ॥२५॥
ज्ञान की दिक्कालाद्यनवच्छिन्नता : उस के लिये साधनावस्था के भूतकाल में ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कोई चिन्तनीय विषय था ही नहीं, न भविष्य में होगा; आज(वर्तमान में) भी उसके मन की वही स्थिति है । वह तो सदा(निरन्तर) ब्रह्मचिन्तन में ही सुख मानता है ॥२५॥
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अध ऊरध दश हूं दिशा, पूरन ब्रह्म समांन ।
सुन्दर ज्ञानी कै सदा, कहिये केवल ज्ञांन ॥२६॥
उस के लिये पूर्व पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर, नीचे आदि दशों दिशाओं में ब्रह्म समान रूप से व्याप्त(पूर्ण) है । अतः वह कहीं भी ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं देख पाता ॥२६॥
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घटाकाश ज्यौं मिलि गयौ, महदाकाश निदांन ।
सुन्दर ज्ञानी कै सदा, कहिये केवल ज्ञांन ॥२७॥
शास्त्र में जैसे घटाकाश को महाकाश का ही अङ्ग माना जाता है; उसी प्रकार वह ज्ञानी संसार के सभी सुखों को ब्रह्मसुख का ही अङ्ग मानता है ॥२७॥
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मुक्ति शिला मूयें कहै, ते तौ अति अज्ञांन ।
सुन्दर ज्ञानी कै सदा, कहिये केवल ज्ञांन ॥२८॥
'मनुष्य का मोक्ष मुक्तिशिला पर ही होता है' - यह भ्रान्त लोगों(जैनों) का कथन है । ज्ञानी तो एकमात्र ब्रह्मज्ञान को ही मोक्ष का श्रेष्ठ उपाय मानता है ॥२८॥
(क्रमशः)

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