मंगलवार, 28 जुलाई 2026

ईश्वरदासजी की रचनायें

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*दादू राम हृदय रस भेलि कर, को साधु शब्द सुनाइ ।*
*जानो कर दीपक दिया, भ्रम तिमिर सब जाइ ॥*
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ईश्वरदासजी की रचनायें = ईश्वरदासजी मारोठ की ये रचनायें देखने में आई है-
१- सत्यराम मंत्र की संस्कृत में व्यख्या
२- “दादू दयालु सत्वराज” यह संस्कृत श्लोकों में हैं, इसमें १८ श्लोक है
३- “दादू दयालु प्रार्थना सप्तक” यह संस्कृत श्लोकों में है । इसमें ९ श्लोक हैं ७ में प्रार्थना है । ८ वें में रचना करने का स्थान काशी बताया है । ९ वें में सप्तक का माहातम्य कहा है ।
४- आगे इन पत्रों में दादूजी की महिमा के कुछ श्लोक हैं, किन्तु इनके आदि में इनका नाम नहीं है और अंत में समाप्ति भी नहीं की है । हो सकता है ये फुटकर श्लोक ही हों व इन पत्रों पर लिखने वाले महानुभाव ने उस निबन्ध से इतने ही श्लोक लिखे हों । किसी भी कारण से ही यह निबन्ध अधूरा ही है ।
५- “सत्यराम स्तोत्र” संस्कृत श्लोकों में है । इसमें १३ श्लोक हैं । इसकी रचना मारोठ में ही हुई है । ईश्वरदासजी काशी से भ्रमण करते हुये भैराणे की यात्रा करने आये तब वहां से मारोठ के रघुनाथदासजी गरीबदासोत ईश्वरदासजी को मारोठ ले आये थे । फिर वे मारोठ में ही ब्रह्मलीन हो गये थे । ‘सत्यराम स्तोत्र’ की रचना मारोठ में ही हुई होगी । “सत्यराम स्तोत्र” की प्रति मैंने जो देखी थी वह वि. सं. १९४४ भादवा वदि ११ बृहस्पतिवार की साधु लालदास की मारोठ में ही लिखी हुई थी । इसकी समाप्ति पर लिखा है~ “इति ईश्वरदासेन विदुषा विरचितंति्वदम्, सत्यरामोंभिधं स्तोत्रं समाप्तिमग मच्छुमाम् ।”
६- ईश्वरदासजी ने श्रीदादूवाणी पर भी टिपण्णी की थी ऐसी जन श्रुति है किन्तु वह मेरे देखने में तो नहीं आई है । उक्त रचनाओं से ज्ञात होता है कि ईश्वरदासजी अच्छे विद्वान्, योगी और विरक्त संत थे । अब उनकी रचना के उदाहरण भी देखें~
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श्री दादूदयालु सत्वराज का दशम श्लोक~
शिखरणीछंद~
“अनाधाराधारो, विदित भव पारस्सुख करो ।
वदान्यो वादान्य, स्सफल कुल धन्य:कालि विधुः ॥
महासारो पारो, निहत रिपु मारो वृष गवच्छ-
शरण्योज्ञानाम्भे, वसतु हृदि दादू धृति धरः ॥१०॥
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“सत्यराम स्तोत्र”- का एकादशम श्लोक- शार्दूल विक्रीड़ित-
श्री दादू सुखदो, नृणां सुमनसा, दादू भजे दादुना ।
पाल्योसि्म प्रभुणा, तदर्चन जनिः कायोस्तु में दादुवे ॥
दादोर्लब्ध बरागता, हरिपदं दादोर्गतिर्दुर्लभा ।
दादो मेस्तु मनो गुरौ वरद हे, दादों भवान्मामव ॥११॥
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लक्ष्मणदासजी का महोत्सव ब्रह्मभोज रघुनाथदासजी ने वि. सं. १९३४ में किया था । उसका सूचक ईश्वरदासजी रचित दोहों में एक शिलालेख है, जो स्थान के तिबारे की ताक में अभी भी सुरक्षित है । उस स्थान की परंपरा यह है १- लक्ष्मणदास जी २- रघुनाथदासजी ३- प्रतापदासजी ४- रामदासजी ५- बालकदास जी वर्तमान है ।
(क्रमशः)

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