रविवार, 26 जुलाई 2026

*२२. अजपा जाप का अंग ~१३/१६*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२२. अजपा जाप का अंग ~१३/१६*
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*वक्र बैन वायू रहित, होय सु अजपा जाप ।*
*रज्जब मन उनमनि लगे, प्रकटे आपे आप ॥१३॥*
अजपा जाप मुख, वचन और प्राण वायु से रहित ही होता है, अजपा जाप से मन समाधि में लग जाता है और अपने आत्म-स्वरूप का साक्षात्कार अपने आप ही हो जाता है ।
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*मिहरि पतिव्रत मीन मत, दोनों नाम न लेहिं ।*
*पै होत इष्ट अलाहिदे, नेह माग जीव देहिं ॥१४॥*
पतिव्रता नारी मुख से तो पति का नाम नहीं लेती किन्तु उसके मन में पति ही बसा रहता है, मछली मुख से तो पानी नहीं पीती किन्तु रोम रोम से पीती ही रहती है, वैसे ही अजपा जाप करने वाला मुख से तो नाम उच्चारण नहीं करता किन्तु भीतर निरंतर करता ही रहता ही रहता है । उक्त तीनों अपने प्रियतमों के अलग होने से प्रेम के मार्ग में अपना प्राण भी त्याग देते हैं ।
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*कछी पंछी हेत ले, अंडे क्यों उपजंत ।*
*रज्जब राम कहे बिन ऐसे, अजपा जाप करन्त ॥१५॥*
कछुवी अपने अंडे दूर जल तट पर रखती है, उसी से वे पककर फूट जाते हैं । कुंज पक्षी हिमालय पर अंडा रखता है, उस पर भारी बर्फ राशि जम जाती है, कूंज उन्हें उन में वृत्ति रख कर पालता है । देखो ये उक्त अंडे माताओं के दूर रहने पर भी स्नेह से बच्चे के रूप में कैसे उत्पन्न हो जाते हैं, वैसे ही राम नाम बोले बिना ही साधक स्नेह से अजपा जाप करते हैं ।
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*हरि जी गाहक हेत के, नारायण लेहिं नेह ।*
*तो मनसा वाचा कर्मना, संतों करो सनेह ॥१६॥*
हरि तो प्राणी के प्रेम के ग्राहक हैं, नारायण हृदय के स्नेह को ही लेते हैं, तब हे संतों ! मन, वचन और कर्म से प्रभु से प्रेम ही करो, प्रेम से ही अजपा जाप होता है ।
(क्रमशः) 

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