🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*दादू शब्दैं ही सूक्ष्म भया, शब्दैं सहज समान ।*
*शब्दैं ही निर्गुण मिले, शब्दैं निर्मल ज्ञान ॥*
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२५. प्रेमदासजी =
प्रेमदासजी गरीबदासजी के थांभे के छापरी ग्राम में दीक्षित हुये थे । वे परमार्थी महात्मा थे । उन्होंने तालाब, कूप आदि बनवाये तथा अन्य भी परमार्थ के कार्य किये थे । वे ईश्वर भजन, श्री दादू वाणी का पाठ व विचार और परोपकार इनको ही अच्छा मानते थे । दादूजी महाराज ने भी तो परोपकार भजन ही बताया है~
"हरिभज साफिल जीवना, परोपकार समाय ।
दादू मरणा तहँ भला, जहँ पशु पक्षी खाय ॥
प्रेमदासजी का देहान्त वि . सं . १८७५ के आस पास हुआ था । वे अच्छे संत थे ।
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२६ रामकादासजी =
रामकादासजी गरीबदासोत गिधाणी ग्राम में दीक्षित हुये थे । आप परम भजनीक संत थे । जैसे दादूजी महाराज ने कहा है कि रात दिन भजन ही करना चाहिये~
"दादू नीका नाम है, हरि हृदय न विसार ।
रात दिवस रटबो करी, रे मन यही विचार ॥"
वैसे ही रामकादासजी रात दिन हरि भजन में ही लगे रहते थे । अधिकतर ध्यान में लगे रहने से लोग उन्हें ध्यानीजी नाम से भी बोलने लग गये थे ।
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इनके दो शिष्य थे, वे भी गुरुजी के उपदेश तथा गुरुजी को निरंतर भजन में लगे रहते देखकर दोनों ही हरि भजन में ही लगे रहते थे । आप वि.सं. १९५६ के आसपास ब्रह्मलीन हुये थे । आपके शिष्य भी एक वि.सं. १९६२ के व दूसरा १९७० के आसपास ब्रह्मलीन हो गये थे । इन तीनों ही महानुभावों ने वैराग्य पूर्वक भजन ही किया था । अन्य सांसारिक प्रपंच में वे लेशमात्र भी मन नहीं लगाते थे ।
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२७. किशोरदासजी = किशोरदासजी अतीत स्थान बीलू में दीक्षित हुये थे । आप पौराणिक विद्वान् तथा अच्छे चिकित्सक थे । आपकी कथा शैली बहुत अच्छी थी । आपकी लिखी हुई भागवत बीलू में तथा बड़ाउ में थी । आपके अक्षर सुन्दर होते थे । आपने भागवत तथा दादूवाणी के प्रवचनों द्वारा भक्त जनता को परमानन्द प्रदान किया था । आप अच्छे विद्वान् संत थे । वि .सं . १९२५ में नारायणा दादूधाम में ही आप ब्रह्मलीन हुये थे ।
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२८ सेवारामजी = सेवारामजी मोटलास ग्राम के निवासी थे । मोटलास दांता रामगढ़ के पास है । ये गरीबदासजी महाराज के तीन पीढ़ी बाद हुये हैं । सुना जाता है, इनके हनुमानजी का इष्ट था । ये बड़े सिद्ध संत थे । बादशाही शासन तथा शाहपुर मनोहर के रावजी द्वारा इनके १२ अस्थ्लों में कोठी कुये जीविका के रूप में निकले हुये थे ।
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२९.३०. नवलदालजी, लक्ष्मणदासजी~
नवलदासजी व लक्ष्मणदास जी ने मारोठ में साधन धाम ने बनाया था । दोनों संत भजनानन्दी थे । उनकी सेवा के लिये मारोठ के तत्कालीन ठाकुर ने ९९ बीघा १७ विसवा भूमि भेंट की थी । लक्ष्मणदासजी के शिष्य रघुनाथदासजी गरीबदासोत मारोठवाले भैराणे की यात्रा करने गये थे । वहां उनको संत श्रेष्ठ ईश्वरदासजी का दर्शन हुआ । ईश्वरदासजी जमात उदयपुर में दीक्षित हुये थे किन्तु थोड़े दिन के पश्चात ही जमात छोड़कर विरक्त रूप में विचरते थे ।
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ईश्वरदासजी की विद्वत्ता, वैराग्य, शील स्वभाव आदि से प्रभावित होकर रघुनाथदासजी ने ईश्वरदासजी से प्रार्थना की- भगवन् ! हमारे यहां मारोठ पधारिये । ईश्वरदासजी ने कहा~ चल तो सकता हूं किन्तु वहां मेरी सेवा उचित रूप से नहीं हो सकेगी । रघुनाथदासजी ने पूछा~ आपकी ऐसी क्या सेवा है ? जिसे हम नहीं कर सकेंगे । ईश्वरदासजी ने कहा~ मैं स्वर साधना तथा हठ योग साधना में लगा हुआ हूँ । अतः भोजन भी स्वर के हिसाब से ही करता हूँ ।
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भोजन के समय आप कहेंगे भोजन करो किन्तु मेरा स्वर उस समय भोजन करने योग्य नहीं होगा तो मैं भोजन नहीं कर सकूंगा । इत्यादिक व्यवहार आप को अच्छा नहीं लगेगा तथा योग साधना में भी पूरा-पूरा बन्धन रहता है । उक्त बातें सुनकर रघुनाथदासजी ने कहा~ सेवा की चिन्ता तो आप छोड़ दें, सेवा तो सभी प्रकार की हो जायगी । फिर ईश्वरदासजी रघुनाथदासजी के साथ मारोठ आ गये । उनकी सभी प्रकार की सेवा सुचारू रूप से होती रही ।
(क्रमशः)
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