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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ९/१२
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काइक बाइक मानसी, कर्म न लागै ताहि ।
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमय, देह-क्रिया सब आहि ॥९॥
ज्ञानी की सभी क्रियाएँ ज्ञानमय : महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसे साधक को, अतिशय ज्ञानवान् होने के कारण, उस के शरीर वाणी एवं मन से होने वाली क्रियाओं(कर्मों) का कोई शुभ या अशुभ फल स्वीकार नहीं होता; क्यों कि उस के मत में ये तीनों ही प्रकार के कर्म उसके देह से होते हैं; अतः जीवात्मा से इन का सम्बन्ध कैसे हो सकता है ! ॥९॥
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पहलैं कियौ न अब करौं, आगै की नहिं आस ।
सुन्दर ज्ञानी ज्ञान करि, काटे बंधन पास ॥१०॥
उस ज्ञानी साधक के मत में - जीवात्मा ने न पहले(भूतकाल में) कोई कर्म किया था, न वर्तमान में कोई कर्म कर रहा है, और न वह भविष्य में ही कोई कर्म करेगा । ज्ञान के आश्रय से यह उत्तम साधक अपने सभी भवबन्धन उच्छिन्न कर चुका है ॥१०॥
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बिधि निषेद जाकै नहीं, नां कछु पाप न पुंन्य ।
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमै, सब करि जानै शुंन्य ॥११॥
ऐसे उत्तम साधक के लिये, ज्ञान की इस उच्च भूमि में पहुँचने पर, न कोई शास्त्रोक्त विहित कर्म करणीय रह जाते हैं, और न कोई निषेधात्मक(अविहित) कर्म त्याज्य रह जाते हैं । न उस के लिये पुण्यकर्म या पापमय कर्म ही ग्राह्य या त्याज्य रह जाता है । ऐसा ज्ञानी समस्त संसार को निराकार निरञ्जन प्रभु से ही व्याप्त मानता है ॥११॥
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हर्ष शोक उपजै नहीं, राग द्वेष पुनि नांहिं ।
सुन्दर ज्ञानी देखिये, गरक ज्ञान के मांहिं ॥१२॥
ऐसी स्थिति में पहुँचने पर, उस ज्ञानी के लिये इस संसार में न कोई हर्षोत्पादक घटना रह जाती है, न कोई शोकमय समाचार । न कहीं उस का राग(प्रेम) रह जाता है, न द्वेष । वह तो इन सब(हर्ष शोक, राग द्वेष आदि) से ऊपर उठकर निरन्तर ज्ञानमय अवस्था(ब्राह्मी स्थिति) में ही स्थित रहता है ॥१२॥
(क्रमशः)

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