रविवार, 26 जुलाई 2026

३०. ज्ञानी कौ अंग ५२/५६

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ५२/५६ 
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अंत्यज ब्राह्मण आदि दै, दार मथै जो कोइ । 
सुन्दर भेद कछू नहीं, प्रगट हुतासन होइ ॥५३॥
[अब श्रीसुन्दरदासजी महाराज ५३ से ५६ तक की चार साषियों से ज्ञान की भेद - भावरहित व्यापकता एवं सब के लिये समान रूप से पवित्रकरण के सामर्थ्य में चार अकाट्य तर्क देकर उसे स्पष्ट कर रहे हैं - ]
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अभेद ज्ञान की व्यापकता के चार उदाहरण : श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - सब जानते हैं कि दो काष्ठों की रगड़ से अग्नि उत्पन्न हो जाती है । अब वे दो काष्ठ किसी ब्राह्मण से मिलें या किसी अन्त्यज(हीन जातिज) से, इससे उस अग्नि की उत्पादनक्रिया में कोई अन्तर नहीं आयगा । उन दोनों काष्ठों को रगड़ने से अग्नि उत्पन्न होगी; ऐसे ही वह अभेदज्ञानोपदेश किसी ब्राह्मण से मिले या अन्त्यज से; उस से ज्ञानप्राप्ति होगी ही - यह निश्चित मानिये ॥५३॥ (१)
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दीपग जोयौ बिप्र घर, पुनि जोयौ चंडाल । 
सुन्दर दोऊ सदन कौ, तिमिर गयौ ततकाल ॥५४॥
इसी प्रकार, सब जानते हैं कि दीपक के प्रकाश से अन्धकार नष्ट होता ही है । अब वह दीपक किसी ब्राह्मण के घर में हो या किसी अन्त्यज के, दीपक के प्रकाश में क्या अन्तर आयगा ! इसी प्रकार इस ज्ञानोपदेश के विषय में भी समझना चाहिये ॥५४॥ (२)
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अंत्यज कै जल कुम्भ मैं, ब्राह्मन कलस मंझार । 
सुन्दर सूर प्रकाशिया, दुहुंवनि मैं इकसार ॥५५॥
सभी जानते हैं कि किसी ब्राह्मण के घर में रखे हुए घट के जल में या किसी अन्त्यज के घर में रखे हुए घट के जल में सूर्य का प्रकाश समान(एक सा) ही पड़ता है । ऐसा नहीं होता कि ब्राह्मण के घट में सूर्य का प्रकाश दूसरा तथा अन्त्यज के घर वाले कुम्भ के जल में सूर्य का कोई दूसरा प्रकाश पड़ता हो; यही स्थिति अभेदज्ञानोपदेश के विषय में भी समझनी चाहिये ॥५५॥ (३)
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अंत्यज ब्राह्मन आदि दे, किंवा रंक कि भूप । 
सुन्दर दर्पन हाथ लै, सो देखै निज रूप ॥५६॥
जैसे किसी ब्राह्मण या अन्त्यज को, किसी राजा या दरिद्र को अपने हाथ में लिये हुए दर्पण में अपना ही रूप दीखता है; उसी प्रकार किसी भी अभेदज्ञानोपदेश से ब्रह्मज्ञान ही होगा, अन्य ज्ञान नहीं ॥५६॥ (४)
(क्रमशः) 

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