*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२०. सुमिरण का अंग ~६९/७२*
.
अर्थ किया उस प्राणी ने, तन मन लाया ठौर ।
रज्जब रह गया राम में, भूल न भासे और ॥६९॥
जिस प्राणी ने अपने तन को परब्रह्म रूप संत सेवा और मन को ब्रह्म चिन्तन रूप स्थान में लगाया है, उसी ने वेदादि का यथार्थ अर्थ समझकर धारण किया है, उसका मन राम के वास्तव स्वरूप में ही स्थिर रहता है, उसे भूल से भी मायिक प्रपंच नहीं भासता है ।
.
कौड़ी कौटि न चाहिये, कहतों केवल राम ।
रज्जब दम दम सुमरिये, नहिं दामों से काम ॥७०॥
माया रहित राम का स्मरण करने के लिये न कौटि रुपयों की आवश्यकता है, अत: प्रति स्वास स्मरण करना चाहिये । स्मरण करना रूप कार्य धन से सिद्ध नहीं होता ।
.
दया रूप नर सु तरु मय, पै गुण स्वाद न जाँहिं ।
ब्रह्म अग्नि निज नाम बिन, रज्जब सुधि१ नहिं माँहिं ॥७१॥
दयालु नर श्रेष्ठ वृक्ष के समान उदार होता है किन्तु जैसे वृक्ष का कटु कषायादि स्वाद नष्ट नहीं होता, वैसे ही दयालु के भी अंत:करण के गुण दूर नहीं होते, वृक्ष-स्वाद अग्नि से जलने पर ही नष्ट होता है । वैसे ही निज नाम स्मरण द्वारा ब्रह्म ज्ञान रूप अग्नि उत्पन्न होता है । तभी दयालु के गुण नष्ट होते हैं, अन्यथा भीतर स्थिर निजात्मा का अनुभव१ नहीं होता ।
.
सप्त धातु तन शुद्ध ह्वै, पड़ पावक प्रभु नाँउ१ ।
रज्जब रज मल ऊतरे, बासदेव२ बलि आँउ ॥७२॥
अग्नि में पड़ने से सात धातुओं का भीतरी मैल तथा बाहर की रज नष्ट होकर वे शुद्ध हो जाती हैं, वैसे ही राम नाम१ चिन्तन द्वारा ब्रह्मज्ञानाग्नि उत्पन्न होकर प्राणी के स्थूल शरीर की हिंसादि रूप रज और सूक्ष्म शरीर का कामादि रूप मैल नष्ट हो जाता है, अत: हम ज्ञानाग्नि२ की बलिहारी जाते हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें