गुरुवार, 2 जुलाई 2026

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ५/८

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ५/८
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घर कहिये सब भूमि पर, भूमि घरनि मैं होइ ।
सुन्दर एकै देखिये, कहन सुनन कौं दोइ ॥५॥
इसी प्रकार, कोई भी घर(भवन) भूमि पर ही स्थित होता है, जब कि सभी घरों में भूमि भी होती ही है; अतः 'भूमि' एवं 'घर' - दोनों एक ही वस्तु हैं, केवल लोकव्यवहार में सुगमता के लिये उन को पृथक् पृथक् कह दिया जाता है ॥५॥
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सुन्दर घर सब गांव मैं, गांव सकल घर मांहिं । 
घर अरु गांव बिचारिये, तौ कछु दूजा नांहिं ॥६॥
इसी प्रकार, सभी घर ग्राम में ही होते हैं, तथा वह ग्राम भी उन घरों से ही कहलाता है । यदि घर एवं ग्राम की यथार्थता पर विचार किया तो उन में कोई भेद(द्वैत) नहीं दिखायी देता ॥६॥ (द्र० - सवैया : ३२/६ छ०)
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वापी कूप तलाव मैं, सुन्दर जल नहिं और ।
एक अखंडित देखिये, व्यापक सबही ठौर ॥७॥
वापी(बाबडी = चौड़ा कूआ), साधारण कूआ, सरोवर(तालाब), इन सब में एक ही जल होता है, तो भी व्यवहारभेद से भिन्न भिन्न नामों से इन को जाना जाता है; इसी प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड में एक अखण्ड एवं व्यापक ब्रह्म ही सर्वत्र ओतप्रोत है ॥७॥ (द्र० – सवैया : ३२/४ छ०) ।
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कोरि किये चित्राम बहु, एक शिला कै मांहिं । 
यौं सुन्दर सब ब्रह्ममय, ब्रह्म बिना कछु नांहिं ॥८॥
जैसे एक ही शिला पर विविध चित्र उकेर दिये जाते हैं; इसी प्रकार यह समस्त ब्रह्माण्ड एक ब्रह्म से ही ओतप्रोत है । यहाँ ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है ॥८॥ (द्र० - सवैया : ३२/५ छ०) 
(क्रमशः) 

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