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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ४९/५२
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चौपरि खेलहिं द्वै जने, सुन्दर बाजी लाइ ।
जीतै सु तौ खुसाल ह्वै, हारै सौ मुरझाइ ॥४९॥
संसार में विजय-पराजय भी एक प्रकार से क्रिया ही है । जैसे - कोई दो खिलाड़ी चौपड़ खेलते हों, उन में अन्त में एक जीतता है और एक हारता है । जीतने वाले को प्रसन्नता होती है और हारने वाले को खिन्नता ॥४९॥
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एक जनौ दुहुं वोर कौं, चौपरि खेलै आंनि ।
सुन्दर हार न जीत कछु, ऐसैं ज्ञानी जांनि ॥५०॥
परन्तु वहाँ एक तीसरा पुरुष भी उनका खेल देखने के लिये दर्शक रूप में आ बैठे । खेल के अन्त में हार जीत के बाद उस हार जीत से न उसको प्रसन्नता होती है, न खिन्नता ही । संसार में यही तटस्थता की स्थिति ज्ञानी की भी समझनी चाहिये ॥५०॥
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सुन्दर देख्या आपुकौ, सुने आपुनै बैंन ।
बूझ्या अपनी बूझि कौं, समुझ्या अपनी सैंन ॥५१॥
वह ज्ञानी ब्राह्मी स्थिति में पहुँचने के बाद, ब्रह्म को सर्वव्यापक समझता हुआ, संसार के सभी रूपों को अपना ही रूप, संसार के सभी शब्दों को अपना ही शब्द, संसार के सभी विचारों एवं संकेतों को अपना ही विचार एवं संकेत समझता है ॥५१॥
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सुन्दर भाया आपु कौं, आया अपुनी ठांम ।
गाया अपने ज्ञान कौं, पाया अपना धांम ॥५२॥
श्रवण मनन निदिध्यासन करते करते उस को सर्वत्र स्व रूप का ही भान हुआ, अतः वह अन्त में स्वरूप में ही स्थित हो गया । इस स्वरूपस्थिति का चिन्तन मनन करता हुआ वह निर्वाण(परम तत्त्व का साक्षात्कार) को प्राप्त हो गया ॥५२॥
(क्रमशः)

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