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*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग २१/२४*
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धरम हनै अघ७ पाप८ अनंत दुख, धरम हनै सब व्याधि९ ।
कहि जगजीवन धरम करि, पंच तत्त सति साधि ॥२१॥
(७. अघ-दुष्कर्म) {८. पाप-अधार्मिक कर्म(हिंसा, चौरी आदि)} (९. व्याधि-रोग)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि धर्म की हानि से ही पाप है अनंत दुख व बिमारियां हैं धर्म करने से पांचो तत्व धरती, गगन वायु जल अग्नि सभी अनुकूल होते हैं ।
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सतधर्मेसु पुरुषेसु, आपदा विपदा गतं ।
कहि जगजीवन दया धरमं, हरि सरणं आतम रतं ॥२३॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि सत्य धर्म के निर्वहन से जीव की आपदायें व विपदाएं मिटती है । दया धर्म धारण करने से से आत्मा प्रभु शरण में लीन रहती है ।
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दया धरमं भगति मरमं, कोटि कर्म निकन्दनं१० ।
कहि जगजीवन रामं नांमं, साच साखि सकन्दनं११॥२४॥
(१०. निकन्दनं-नष्ट करने वाला) (११ . सकन्दनं-हार्दिक कष्ट के साथ)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि दया व धर्म ही भक्ति का सार हैं । जो करोड़ो कर्मों के संशय दूर करते हैं उनके दोष निवारण करते हैं । राम नाम तो सत्य की साक्षी है चाहे उसमें कितने ही हार्दिक कष्ट हों ।
(क्रमशः)

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