मंगलवार, 18 अगस्त 2026

*२६. भजन प्रताप का अंग ~९/१२*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~९/१२*
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*तन मन आतम लोह को, मिल्या सु पारस नांउ ।*
*तिन तीन्यों कचंन किये, सत सुमिरन बलि जांउ ॥९॥*
तन, मन और बुद्धि रूप लोह को नाम रूप पारस मिला है । पारस स्पर्श से जैसे लोहा सोना बन जाता है वैसे ही चिन्तन ने तन, मन और बुद्धि इन तीनों को शुद्ध बना दिया है, अत: सत्य स्वरूप परमात्मा के नाम स्मरण की मैं बलिहारी जाता हूँ ।
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*नाम प्रताप पषान तिरे जल, तो प्राणि तिरे क्यों नाँहिं ।*
*रज्जब रार्यों१ देखिये, फहम२ करो मन माँहिं ॥१०॥*
नाम प्रताप से सेतु बाँधते समय पत्थर तिरे हैं, तो फिर प्राणी क्यों न तिरेंगे ? अपने मन में ज्ञान२ धारण करके ज्ञान नेत्रों१ से देखो तभी नाम का प्रताप भली प्रकार भासेगा ।
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*देवल१ फेर्या चक्र ज्यों, प्रतिमा पींडा माँहिं ।*
*भृत्य२ भाव भंजन गढ्या४, कुलाल३ सु चिन्हे नाँहिं ॥११॥*
भजन के प्रताप से नामदेव के लिये मंदिर१ को कुम्हार चक्र को फेरता है वैसे ही फेर दिया था और चक्र फेरने से उस पर धरा मिट्टी का पींडा फिरता है, वैसे ही मूर्ति भी फिर गई थी । इस प्रकार भक्त२-भाव रूप बरतन बनाया४ गया अर्थात भक्त की इच्छानुसार कार्य कर दिया गया, किन्तु मंदिर और मूर्ति ने तो फेरने वाले ईश्वर रूप कुम्हार३ को नहीं जाना, जिसने भजन किया था उन नामदेव ने ही जाना । विशेष-नामदेव की जूतियाँ कीर्तन करते समय कमर से खुलकर सभा में गिर पड़ी थीं, तब सबने बाहर निकाल दिया था, वे रुष्ट होकर मंदिर के पीछे जा बैठा थे, तब भगवान के द्वारा उक्त घटना घटित हुई थी ।
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*रज्जब मंदिर मूर्ति सुई सम, चुंबक चिन्तन नाम ।*
*अचल चले एके मिल्यूं, बधे कौन की माम१ ॥१२॥*
मंदिर और मूर्ति तो सुई के समान है, नाम चिन्तन चुंबक पत्थर के समान है, जैसे चुंबक से सुई हिलने लगती है, वैसे नामदेव के नाम चिन्तन से मिलकर अचल मंदिर और मूर्ति चंचल होकर फिर गये थे । इस घटना में किसकी शक्ति१ रूप महिमा अधिक मानी जायेगी ? नाम चिन्तन की ही मानी जायेगी ।
(क्रमशः)

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