🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*इब सुख कारण फिर दुख पावै,*
*अजहुँ न चेतै क्यों डहकावै ।
*दादू कहै सीख सुन मेरी,*
*कहु करीम संभाल सवेरी ॥*
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१- कृपारामजी १०७ वर्ष तक धरातल पर रहे । आपकी समाधि की छत्री उक्त परम्परा के कुये व प्राचीन बाग़ में नारायणा ग्राम के दक्षिण पश्चिम की कौंण में ग्राम से बाहर धोबोलाव तलाब के रास्ते पर है । छत्री पर निम्न प्रशस्ति अंकित है । सवैया~ “छाप छपी धरणी धर पै, डरपै अरि देखत हा उठ भाजै ।
कोउ न धीर धरे सनमु खहि, जाय जहां कृपाराम जु गाजै ॥१॥
घने घमसान नहीं अवसान सु, आश तजी जहँ जाय विराजै ।
दादूदयाल के भेष प्रसिद्ध सु, ऐसा विरुद कृपाल का बाजै ॥२॥
दोहा~ वर्ष एक सौ सात लौं, रहे धरा पर आप ।
पीछे सुरपुर को गये, मेटि सकल सन्ताप ॥१॥
वि. सं. १८५७ कार्तिक वदी ७ शुक्रवार । उक्त सवैया इनकी विशेषता का द्योतक है ।
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तुलसीदासजी~
६- तुलसीदासजी- ये अच्छे संगीतज्ञ थे । आपने बनारस में संगीत का अच्छा अभ्यास किया था । सुनते हैं जब वे स्वरानन्द में निमग्न होकर गाते थे तब चमत्कार देखने वाले लोग तुला में एक ओर रुपये भर देते और दूसरा पलड़ा खाली रखते थे । इनकी स्वरानन्द की पराकाष्ठा होने पर खाली पलड़ा और रुपयों से भरा पलड़ा दोनों बराबर हो जाते थे । यह इनका चमत्कार देखकर दर्शक मंत्र मुग्ध से हो जाते थे । ऐसा चमत्कार दिखाकर भी ये किसी से कुछ भी नहीं लेते थे । निरीह और साधनों में लीन रहने वाले ये महान् योगी संत थे ।
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दयारामजी~
७- दयारामजी~ ये प्रारब्धी पुरुष थे । इनके पास अत्यधिक सम्पदा थी । ये व्यवहार कुशल तथा पुण्यात्मा संत थे । परोपकार करते ही रहते थे । इन्होंने कई ब्रह्मभोज किये थे और और विप्रों को अच्छी दक्षिणा दी थी । जब भी इच्छा होती तभी ग्राम को, आस पास की बस्तियों, जातियों को जिमा देते थे । अच्छे परोपकारी तथा भजनानन्दी संत हुये हैं । कैरिया का स्थान अब भी अच्छी स्थिति में है । ३- कृष्णदेवजी महराजकी शिष्य परम्परा का स्थान नारायणा दादूधाम की परम्परा इस प्रकार है~ १ सांवलरामजी २- नानकदास जी ३- सुखरामजी ४- शंभूरामजी ५- बालकरामजी वि. सं. १९०७ नारायणा स्थान की परंपरा यहां समाप्त ।
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हरजीरामजी = ४- स्थान गौड़जी का गुढ़ा की परंपरा-आचार्य कृष्णदेवजी महाराज के शिष्य १- भंडारी ब्रह्मदासजी २~ नारायणदासजी ३- हरजीरामजी । हरजीरामजी नारायणदास के शिष्य नारायणा में ही हुये थे । १- भंडारी ब्रह्मदासजी अच्छे महात्मा हुये हैं । इनकी समाधि चरण चौकी नारायणा में हरजीरामजी के महल के सामने एक कुटिया में है । उसमें वि. सं. १८५२ आषाढ़ सुदि १२ सोमवार अंकित है । यह समाधि चमत्कारी है ।
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कुछ समय पहले एक नारायणा का बनियां का लड़का समाधि वाली कुटिया में शौच जाने लगा था । तब बैठते ही उसके सामने श्वेत वस्त्रधारी एक महान् संत प्रकट हो गये । लड़का डर कर भाग गया और छः मास तक उसको ज्वर आता रहा । फिर ब्रह्मदासजी की मन्यत मानने और उनके चरणों की पूजा करने से ठीक हुआ था । ऐसे ही उनके अनेक चमत्कार वर्तमान में महल में रहनेवाले रामप्रसादजी स्वामी सुनाते हैं । उक्क्त समाधि स्थल में हरजीरामजी के चरण भी हैं, उसमें लिखा है ~
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"वर्ष एक नव सोमगुण, जन्म अष्टमी लीन ।
मिथ्या भव निधि जानकर, निजपद मिले प्रवीण ॥१॥
दादू के पथ अवतरे, सिद्ध दिगम्बर वीर ।
वर श्री हरजीरामजी, नृपकुल जानों धीर ॥२॥
शिष जूं दूलहराम तिन, परम भक्ति कर प्यार ।
चरण धरे गुरु के विमल, रचना रचो अपार ॥३॥"
(क्रमशः)

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