मंगलवार, 11 अगस्त 2026

३१. अन्योन्य भेद कौ अंग १७/२०

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३१. अन्योन्य भेद कौ अंग १७/२०
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ब्रह्म देह कै मध्य है, अंतहकरण उपाधि । 
तत् संबंधी आतमा, ताहि लगी यह ब्याधि ॥१७॥ 
अन्तःकरण : सांख्यशास्त्रोक्त सृष्टिप्रक्रिया के पच्चीस तत्त्वों में एक अन्तःकरण भी वर्णित है, जो ब्रह्म और देह के बीच सेतु(पुल) का कार्य करता है । इसी अन्तःकरण उपाधि से जब आत्मा का सम्बन्ध हो जाता है तभी इस आत्मा को यह अविद्या रोग लग जाता है ॥१७॥ 
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याही सुद्ध असुद्ध है, याकै ज्ञांन अज्ञांन । 
जड सौं मिलि जडवत भयौ, जीवातम सो जांन ॥१८॥ 
यह जीवात्मा ही अन्तःकरण उपाधि से अविद्याग्रस्त होकर स्वयं को कभी अशुद्ध या कभी शुद्ध या कभी अज्ञानी या ज्ञानी मानता रहता है । यह जड प्रकृति से मिल कर जड के समान व्यवहार करने लगता है । वस्तुतः यह जीवात्मा ज्ञानवान् है ॥१८॥ 
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अस्ति असत सौ जानिये, भाति भयौ जड रूप । 
प्रिय पुनि हूवौ दुःखमय, भूलि पर्यौ भ्रम कूप ॥१९॥ 
यह अविनाशी होता हुआ भी जड(प्रकृति) से सम्बन्ध बनाकर स्वयं को विनाशी(अनित्य) समझने लगता है । स्वयं चेतन होता हुआ भी स्वयं को जड(अनात्म) मानने लगता है । सदा आनन्दमय होता हुआ भी प्रकृति-संयोग के कारण भ्रान्त होता हुआ स्वयं को दुःखमय मानने लगता है । इस प्रकार यह भ्रम(अज्ञान) कूप में जा गिरता है ॥१९॥
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यह लक्षण अज्ञान कौ, देह सु मान्यौ आप । 
सुन्दर या अभिमान तैं, व्यापैं तीनौं ताप ॥२०॥ 
वस्तुतः यह भ्रम अज्ञान का चिह्न है । इसको देह के संसर्ग से जीव ने स्वीकार कर लिया है । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - 'यह देह मेरा है' - इस देहाभिमान के कारण इस शुद्ध जीवात्मा को त्रिविध लौकिक सन्ताप दुःखी करने लगते हैं ॥२०॥
(क्रमशः)

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