*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२५. नाम निरूप आदम अकलि का अंग ~१/४*
इस अंग में मानव ने अपनी बुद्धि से रूप रहित परमात्मा के जो नाम रखे हैं, उन नामों तथा मानव की बुद्धि विषयक विचार कर रहे हैं ।
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*नाम नाव आदम१ गढी, भर्या सु आदम भार ।*
*आदम खेवहिं अकलि सौं, आदम उतरहिं पार ॥१॥*
ज्ञानी मनुष्यों१ ने ही नाम रूपी नौका बनाई है और साधक मनुष्य रूप बोझा भरा है, गुरु रूप मनुष्य ही बुद्धि द्वारा उसे चलाते हैं, इस प्रकार ही साधक संसार -सिन्धु के पार उतरते हैं ।
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*धन्य धन्य आदम अकलि, अकल कल्या धर नांउ ।*
*रज्जब रीझ्या देखकर, बुद्धि बँधन बलि जांउ ॥२॥*
मनुष्य की बुद्धि को धन्य है जिसने कलारहित ब्रह्म का भी नाम रख करके उसे कलायुक्त-सा कर दिया है, बुद्धिमानों के इस कलायुक्त-सा कर दिया है, बुद्धिमानों के इस कला-बन्धन को देखकर मैं भी अति प्रसन्न हूँ और बलिहारी जाता हूँ ।
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*नाम नेह नर के बँध्या, निराकार निर्बन्ध ।*
*रज्जब धन्य आदम अकलि, अकलहिं बाह्या फंद ॥३॥*
नाम-स्मरण के कारण ही बन्धनरहित निराकार परमात्मा नर के स्नेह में बँधा है, मनुष्य की बुद्धि को धन्य है, जिसने कलारहित परमात्मा को कला रूप फँदे में डाल दिया ।
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*अकलि१ बड़ी दी आदम२ हिं, नाम निनाम३ हिं दीन्ह ।*
*अगह गह्या जिहिं बुद्धि सौं, अलग सलग४ कर लीन्ह ॥४॥*
सृष्टि कर्त्ता ने मनुष्य को विशाल बुद्धि दी है, जिसके बल से मानव ने नाम-रहित को भी नाम प्रदान किया है और मन इन्द्रियों के द्वारा जो नहीं ग्रहण किया जाता है, उस ब्रह्म को आत्म रूप से ग्रहण किया है, इस प्रकार जो जीव और ब्रह्म अलग भास रहे हैं, उन्हें एक कर लिया है ।
(क्रमशः)

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