शनिवार, 29 अगस्त 2026

*२६. भजन प्रताप का अंग ~३७/४०*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~३७/४०*
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*दूजी दिल व्यापे१ नहीं, जिंहिं हिरदय हरि आन२ ।*
*ज्यों रज्जब रजनी गई, देखो देखत भान३ ॥३७॥*
देखो, जैसे सूर्य३ को देखते ही रात्रि चली जाती है, वैसे ही जिसके हृदय में भजन द्वारा हरि आजाते२ हैं, उसके हृदय को हरि चिन्तन के बिना दूसरी बात प्रभावित१ नहीं करती ।
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*भाव भानु भासत समय, तम तारे गुण नाश ।*
*जन रज्जब रजनी पड्यां, फेरी करे परकाश ॥३८॥*
सूर्य के दीखते ही अँधेरा और तारे नहीं दिखाई देते किन्तु रात्रि पड़ते ही पुन: अँधेरा होता है और तारे प्रकाश करने लगते हैं, वैसे ही भाव द्वारा मन भगवान् में लय होने के समय तो भ्रम और दुर्गण नहीं भासते किन्तु संसार की और मन जाते ही पुन: भ्रम और दुर्गुण हृदय में भासने लगते हैं ।
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*रज्जब उर गिरि की गुफा, ज्ञान दीप तम दूरि ।*
*चित चेतन सु चिराक बिन, तहाँ तिमिर भर पूरि ॥३९॥*
जैसे पर्वत की गुफा में चिरकाल से अँधेरा भरा रहता है, किन्तु दीपक जलाते ही दूर हो जाता है वैसे ही चिरकाल से हृदय में अज्ञान है, किन्तु ज्ञान आते ही दूर हो जाता है । अत: जब तक भजन द्वारा चित्त में चेतन ब्रह्म का साक्षात्कार रूप चिराग नहीं आता तब तक भ्रम रूप अंधकार परिपूर्ण ही रहेगा ।
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*पाप पुंज कुल१ कालिबाँ२, सकल नाम सौं जाँहिं ।*
*ज्यों रज्जब मद३ भाजना४, फूटा गंगा माँहिं ॥४०॥*
जैसे मदिरा३ का बर्तन४ गंगा में फूटता है तब मदिरा गंगा जल में मिलते ही शुद्ध हो जाती है, वैसे ही जब मन नाम-स्मरण में लगता है तब संपूर्ण१ तन२ शुद्ध हो जाता है, उसकी सभी पापराशि चली जाती है ।
(क्रमशः)

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