शनिवार, 29 अगस्त 2026

*२६. भजन प्रताप का अंग ~४१/४४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~४१/४४*
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*जाति पांति कुल सब गये, राम नाम के रंग ।*
*रज्जब लागे लोह ज्यों, पारस का परसंग ॥४१॥*
लोह को पारस का स्पर्श प्राप्त होता है तब उसकी लोह रूप जाति, हिंसक शस्त्रों की पंक्ति और लोह वस्तुएँ बनने की कुल परंपरा ये सभी बातें चली जाती है और वह सुवर्ण होकर सर्वप्रिय भूषण बन जाता है, वैसे ही राम नाम स्मरण का रंग लगने पर प्राणी का जाति दोष, पांति अर्थात संग दोष और कुल परंपरा सभी दोष नष्ट हो जाते हैं, फिर वह संतत्त्व को प्राप्त होकर सर्वप्रिय ब्रह्म-रूप ही हो जाता है ।
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*ताँमें के पात्र सु घने, लोहे के हथियार ।*
*रज्जब पारस परसतें, कुल कंचन व्यवहार ॥४२॥*
ताँबे के बहुत से बर्तन हो तथा लोहे के बहुत से हथियार हो, पारस के स्पर्श होते ही वे सब सुवर्ण हैं, ऐसा वचन व्यवहार होता है । वैसे ही पूर्व चाहे कोई भी जाती हो भगवद् भजन करने पर वे सभी भक्त कहे जाते हैं ।
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*संगति साधू सूर की, आतम अंभ१ समान ।*
*कुल कालिबाँ३ कुठौर कस२, सुमिरन शून्य४ विलान ॥४३॥*
संत संगति सूर्य-किरण के समान है आत्मा जल१ के समान है । सूर्य-किरण के संग से जल खराब स्थान पर कैसे२ रह सकता है ? वह तो आकाश३ में चला जाता है, वैसे ही संत संगति से प्राणी कुल और शरीर४ की आसक्ति में बँधा कैसे रह सकता है ? वह तो स्मरण द्वारा ब्रह्म में विलीन हो जाता है, यही भजन का प्रताप है ।
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*रज्जब कागज टाट के, मसि माँहिं व्यवहार ।*
*वेद कुरान सु वन्दिये, जे बिच आया करतार ॥४४॥*
कागज टाट के बनते हैं, उनमें स्याही के द्वारा वेद तथा कुरान लिखने का व्यवहार किया जाता है, तब सभी कागज और स्याही को प्रणाम करते हैं, फिर जिसके हृदय में सृष्टीकर्ता परमेश्वर का स्मरण सदा के लिये आ गया है, उन्हें क्यों नहीं प्रणाम किया जायेगा ? अर्थात किया जाता है और वह भजन का ही प्रताप है ।
(क्रमशः)

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